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April 07, 2023

आदर्शवाद (Idealism)

Utkarsh Education

 आदर्शवाद 


आदर्शवाद का अर्थ 

आदर्शवाद अंग्रेजी शब्द idealism का पर्याय समझा जाता है। आइडियलिज्म दो शब्दों के योग से निर्मित है—(1) Idea' अर्थात् विचार तथा (2) 'ism' अर्थात् वाद शाब्दिक व्युत्पत्ति के अनुसार आदर्शवाद (Idealism) का अर्थ विचारवाद होता है। प्राचीन यूनानी दार्शनिक प्लेटो (Plato) आदर्शवादी विचारधारा में मन या विचार की ही चिरन्तन सत्ता स्वीकार करता था, अर्थात् इस विचारधारा के अनुयायीयों को मनवादी (mentalist) या आध्यात्मवादी (spiritualist) भी कहा जाता था। कालान्तर में उच्चारण की सुविधा के कारण मूल शब्द आइडियाज्म में 'ल' ध्वनि सम्मिलित हो गई और इस शब्द का रूपान्तर आइडियलिज्म (Idealism) हो गया जो हिन्दी के आदर्शवाद का परिचायक बना। आदर्शवाद का अर्थ, पाश्चात्य विचारकों के अनुसार, इस प्रकार है- "इस दर्शन के अन्तर्गत आत्मा और मन को लेकर मानव और प्रकृति के सम्बन्ध पर प्रकाश डाला जाता है और जीवन में चिन्तन को मुख्य स्थान दिया जाता है।“ आदर्शवादी प्राकृतिक, भौतिक तथा वैज्ञानिक तत्त्वों की अपेक्षा मानव तथा उसके विचारों, भावों तथा आदशों को अधिक महत्त्वपूर्ण मानते हैं और जीवन का लक्ष्य शाश्वत सत्यों, आदर्शो एवं मूल्यों की प्राप्ति को मानते हैं।


आदर्शवाद प्राचीनतम विचारधारा है। पाश्चात्य देशों में आदर्शवाद का प्रतिपादन प्रसिद्ध दार्शनिक सुकरात और प्लेटो ने किया। आधुनिक युग में आदर्शवादी दार्शनिकों से डेकार्ट (Descrates), स्पिनोजा , लाइबनीज, बर्कले , कान्ट, फिक्टे, हीगल (Hegel), शैलिंग, तथा जेन्टाइल (Gentile), प्रमुख हैं। शिक्षा में आदर्शवादी विचारधारा के प्रवर्तकों में कमेनियस (Comenius), पेस्टालॉजी (Pestalozzi) तथा फ्रोबेल (Froebel) मुख्य हैं। भारतीय आदर्शवादी दार्शनिकों में महात्मा गाँधी, स्वामी विवेकानन्द, महर्षि अरविन्द तथा रवीन्द्रनाथ टैगोर की गणना की जा सकती है।


परिभाषाएँ 

आदर्शवाद के सन्दर्भ में कुछ दार्शनिकों द्वारा दी गई निम्नांकित परिभाषाएँ उल्लेखनीय हैं—

 हैरोल्ड टाइटस  — "आदर्शवाद यह स्वीकारता है कि वास्तविकता भौतिक वस्तुओं तथा शक्ति की अपेक्षा विचारों, मन या स्व में निहित है।" 

हॉर्न  — “आदर्शवादी शिक्षा दर्शन मानसिक जगत का मानव को अभिन्न अंग समझने की अनुभूति का विवरण है।" 

रॉस  — "आदर्शवाद के अनेक एवं विविध रूप हैं किन्तु इन सबका अन्तर्निहित सिद्धान्त है कि मस्तिष्क या आत्मा ही सम्पूर्ण जगत का मूल तत्त्व है तथा चिरन्तन सत्ता मानसिक है। 


आदर्शवाद के प्रमुख सिद्धान्त 


आदर्शवाद के प्रमुख सिद्धान्त निम्नलिखित हैं-


1. सम्पूर्ण जगत् के दो रूप  - आदर्शवाद के अनुसार सम्पूर्ण जगत् के केवल दो रूप हैं—(1) आध्यात्मिक जगत् तथा (2) भौतिक जगत् । आदर्शवादी भौतिक जगत् की तुलना में आध्यात्मिक जगत् को अधिक महत्त्व देते हैं। उनका विश्वास है कि आध्यात्मिक जगत् क तुलना में भौतिक जगत् केवल एक झलक मात्र है। लाइबनीज महोदय ने लिखा है- “भौतिक तत्त्वसार रूप में मानसिक या आध्यात्मिक है। इसी प्रकार फेचनर महोदय का कथन है- "विश्व का भौतिक पहलू सार्वभौमिक मन का बाह्य प्रकटीकरण है।" 


2. वस्तु की अपेक्षा विचार का महत्त्व - आदर्शवादियों के अनुसार मन तथा आत्मा का ज्ञान केवल विचारों के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है। इसलिए उन्होंने भौतिक जगत् के पदार्थों तथा वस्तुओं की तुलना में विचार एवं भाव जगत् को अधिक महत्त्वपूर्ण माना है। उनका पूर्ण विश्वास है कि वस्तु अथवा पदार्थ असत्य है। केवल विचार की सत्य हैं, सर्वव्यापी हैं तथा अपरिवर्तनशील हैं।


3. जड़ प्रकृति की अपेक्षा मनुष्य का महत्त्व -आदर्शवाद के अनुयायी जड़ प्रकृति की अपेक्षा मनुष्य को अधिक महत्त्व देते हैं। इसका कारण यह है कि मनुष्य में विचार तथा अनुभव करने की शक्ति होती है। क्योंकि आदर्शवादी अनुभव जगत को अधिक महत्त्व देते हैं, इसलिए अनुभवकर्ता स्वयं और भी अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाता है । रस्क (Rusk) ने मनुष्य के महत्त्व पर प्रकार डालते हुए लिखा है- "इस आध्यात्मिक तथा सांस्कृतिक वातावरण का निर्माण स्वयं मनुष्य ही किया है, अर्थात् समस्त नैतिक तथा आध्यात्मिक वातावरण समस्त मनुष्यों की रचनात्मक क्रियाओं का ने ही फल है।" 

4. आध्यात्मिक सत्यों तथा मूल्यों में विश्वास  – आदर्शवादियों के अनुसार जीवन का लक्ष्य आध्यात्मिक मूल्यों तथा सत्यों को प्राप्त करना है। ये मूल्य हैं‐ (1) सत्य (2) शिवं तथा (3) सुन्दरम्। आदर्शवादियों के अनुसार मूल्य अमर हैं। जो मनुष्य इन आध्यात्मिक मूल्यों को जान लेता है वह ईश्वर को प्राप्त कर लेता हैं। एस० रॉस का भी यही मत है- आदर्शवादियों के अनुसार सत्य, शिवं तथा सुन्दरम् निरपेक्ष गुण जिसमें से प्रत्येक अपनी आवश्यकता के कारण उपस्थित है तथा वह अपने आप में पूर्णतया वाहनीय है।


5. व्यक्तित्व के विकास का महत्त्व  - आदर्शवादी दार्शनिक मनुष्यों के व्यक्तित्त्व को अधिक मूल्यवान समझते हैं। अतः वे व्यक्तित्व के विकास पर विशेष बल देते हैं। उनके अनुसार व्यक्तित्व के विकास का अर्थ आध्यात्मिक पूर्णता प्राप्त करना है। प्लेटो का मत है कि प्रत्येक व्यक्ति का एक आदर्श व्यक्तित्व होता है जिसको प्राप्त करने के लिए यह निरन्तर प्रयत्नशील रहता है। 


6. भिन्नता में एकता के सिद्धान्त का समर्थन – आदर्शवादी एकता के सिद्धान्त का समर्थन करते हैं। उनका विश्वास है कि संसार की समस्त वस्तुओं में भिन्नता हुए भी एकता निहित है। इसी एकता को उन्होंने एक शक्ति, चेतना तत्त्व अथवा ईश्वर आदि विभिन्न नामों से पुकारा है।


7. सर्वोच्च ज्ञान आत्मा का ज्ञान है  — आदर्शवादी दार्शनिक आत्मा के ज्ञान को ही सर्वोत्कृष्ट ज्ञान मानते हैं। उनके अनुसार यह ज्ञान इन्द्रियों के द्वारा संभव नहीं बल्कि तर्क के द्वारा होता है। तर्क से प्राप्त ज्ञान वास्तविक होता है और वह मनुष्य के द्वारा सरलता से ग्राह्य होता है। 


आदर्शवाद के रूप 

रॉस महोदय के अनुसार, आदर्शवाद के विविध रूप हैं।

 इनमें से कुछ प्रमुख रूपों का वर्णन प्रकार है-

1. आत्मनिष्ठ आदर्शवाद  - आदर्शवाद के इस रूप का प्रतिपादक एवं प्रमुख समर्थक आइरिश दार्शनिक बिशप बर्कले ( Bishop Berkely) था। उसने तत्कालीन भौतिकवाद के दुष्परिणामों को देखकर आत्मनिष्ठ आदर्शवाद का समर्थन किया। उसके विचार से वस्तु का अस्ति केवल मन के कारण है, अपने आप नहीं वह बाह्य जगत को केवल मन का प्रत्यक्षीकरण मानता है। आत्मनिष्ठ आदर्शवाद के अनुसार, संसार एक मानसिक जगत है जहाँ पर विचारों का सर्वोच्च स्थान है। सत्य वास्तविकता  मन ही है।


2. प्रपंचात्मक आदर्शवाद  — वर्कले के आत्मनिष्ठ आदर्शवाद को काण्ट (Kant) ने भी स्वीकार किया किन्तु उसने बर्कले के विपरीत वस्तु जगत का भी अस्तित्व स्वीकार किया है। इस कारण उसने प्रपंचात्मक आदर्शवाद का प्रतिपादन किया। काण्ट ने अन्तरात्मा अनुभव, कर्तव्य और नैतिक मूल्यों के जगत को वास्तविक माना है। उसका विचार है कि हम जो कुछ भी जानते हैं वह प्रपंचात्मक ज्ञान है इसके अतिरिक्त जो वास्तविक जगत है उसका हमको प्रत्यक्ष ज्ञान हो सकता है।


3. निरपेक्ष आदर्शवाद  - आदर्शवाद की इस विचारधारा के प्रतिपादक हीगल (Hegal) और प्रमुख समर्थक फिक्टे (Fichte) हैं। इस विचारधारा को परम् आत्मा का आदर्शवाद भी कहा जाता है। फिक्टे आत्मा की निरपेक्ष सत्ता को स्वीकार करता है। उसके अनुसार, 'समस्त सत्ता आत्म की है। हीगल के अनुसार, ब्रह्माण्ड एक महान 'विचार प्रक्रिया' (Thought Process) है। उसकी धारणा थी कि ईश्वर विचार करने वाला है, उसके विचार का बाह्य और दृष्टिगोचर होने वाला रूप ही यह भौतिक जगत् है।


4. व्यक्तिगत आदर्शवाद—आदर्शवाद के इस रूप के पोषक जर्मन दार्शनिक रूडोल्फ यूकेन थे। व्यक्तिगत आदर्शवाद में उन्होंने प्रकृति एवं आत्मा को सक्रिय व्यक्तिगत अनुभव के द्वारा जोड़ने का प्रयास किया है। व्यक्तिगत आदर्शवाद व्यक्ति के नैतिक आदर्शों पर बल देता है यह व्यक्ति के विकास पर प्रभाव डालने वाले तत्त्वों पर भी विश्वास करता है। इसमें मानव प्राणी के जीवन को साधारण प्राणियों की अपेक्षा सर्वोच्च स्थान प्रदान किया गया है।


5. प्लेटो का आदर्शवाद  — प्लेटो के आदर्शवाद में नैतिक मूल्यों को सर्वाधिक महत्त्व प्रदान किया गया है। यह सौन्दर्यपरक एवं नैतिक मूल्यों के दर्शन के रूप में कार्य करता है। प्लेटो के आदर्शवाद को स्पष्ट करते हुए रॉस ने लिखा है- "इसकी व्याख्या किये जाने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि संसार में निरपेक्ष सुन्दर, निरपेक्ष शिव (अच्छाई) और निरपेक्ष महानता इत्यादि का अस्तित्व है। इस जगत् में हम जिस वस्तु को वास्तव में अच्छी या सुंदर देखते हैं वह इस कारण अच्छी या सुंदर है क्योंकि उसमें निरपेक्ष अच्छाई या सुन्दरता की प्रकृति का कुछ अंश है।"


आदर्शवाद और शिक्षा 


शिक्षा आदिकाल से ही विभिन्न दार्शनिक विचारधाराओं से प्रभावित होती चली आ रही है किन्तु इस पर सबसे अधिक प्रभाव आदर्शवाद का पड़ा है। शिक्षा के क्षेत्र में आदर्शवाद को प्रमुखता देने वालों में सर्वप्रथम प्लेटो, कामेनियस, पेस्टालॉजी  और फ्रोबेल  का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इन्होंने शिक्षा के अन्य अंगों की अपेक्षा उद्देश्यों पर अधिक बल दिया है और शिक्षा के निश्चित तथा उत्तम आदर्शों का निर्धारण किया है। 


(1) आदर्शवाद और शिक्षा के उद्देश्य 

आदर्शवाद के अनुसार शिक्षा के अधोलिखित उद्देश्य हैं-

 1. मानव ईश्वर की सुन्दर एवं महानतम कृति है। इसलिये शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य मानव व्यक्तित्व का विकास या आत्म-साक्षात्कार है।

2. बालक को आध्यात्मिक मूल्यों एवं सत्यों  की अनुभूति कराना।

 3. बालक को सत्यं शिवं, सुन्दरम् के आदर्श वाक्य को अपने जीवन का आधार बनाना।

4. सांस्कृतिक घरोघर की रक्षा करना एवं उसमें योगदान देना।

5. बालक की बुद्धि एवं विवेक का विकास करना। 

6. बालक के जीवन में पवित्रता को प्रमुख स्थान देना।

7. बालक की मूल प्रवृत्ति को आध्यात्मिक प्रवृत्ति में बदलना।


(2) आदर्शवाद और पाठ्यक्रम 

प्राचीन आदर्शवादी प्लेटो के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य - सत्यम् शिवम् सुन्दरम् के आदशों को प्राप्त करना है। इसलिए पाठ्यक्रम में उन सब विषयों को स्थान दिया जाना चाहिए जो इन मूल्यों की ओर ले जाते हैं। मनुष्य की प्रमुख क्रियाएं बौद्धिक, कलात्मक और नैतिक हैं। बौद्धिक क्रियाओं के लिए पाठ्यक्रम में भाषा, साहित्य, इतिहास, भूगोल, गणित और विज्ञान को स्थान दिया जाना चाहिए। कलात्मक क्रियाओं के लिए कला और कविता का अध्ययन आवश्यक है। नैतिक क्रियाओं हेतु पाठ्यक्रम में धर्म, नीति-शास्त्र, अध्यात्म-शास्त्र जादि का अध्ययन सम्मिलित होना चाहिए। 


(3) आदर्शवाद और शिक्षण विधियाँ 

आदर्शवादियों ने शिक्षा क्षेत्र में अनेक शिक्षण विधियों का विकास किया। प्लेटो के गुरु सुकरात ने वाद-विवाद, व्याख्यान तथा प्रश्नोत्तर विधियों को अपनाया। प्लेटो प्रश्नोत्तर विधि के साथ-साथ संवाद-विधि  का प्रयोग करते थे। प्लेटो के शिष्य अरस्तू ने आगमन तथा निगमन  विधियों के प्रयोग पर बल दिया। आधुनिक आदर्शवादी विचारकों में हीगल ने तर्क विधि , पेस्टालॉजी ने अभ्यास विधि, हरबार्ट ने अनुदेशन निधि  तथा फ्रोबेल ने सेन-विधि का विकास किया।


(4) आदर्शवाद व अनुशासन आदर्शवादी अनुशासन की स्थापना पर बहुत बल देते हैं। थॉमस और लैंग के शब्दों में "प्रकृतिवादियों का नारा 'स्वतन्त्रता है, जबकि आदर्शवादियों का नारा अनुशासन' है।" 

लेकिन आदर्शवाद द्वारा समर्पित अनुशासन दमनात्मक न होकर प्रभावात्मक है। दूसरे शब्दों में आदर्शवादी बाह्य नियन्त्रण एवं शारीरिक दण्ड का विरोध करते हैं तथा पूर्णकाओं एवं के आधार पर ही अनुशासन की स्थापना चाहते हैं। 


विश्वास है कि बालक अनुशासन में रहकर ही आत्मानुभूति को प्राप्त कर सकता है। 


(5) आदर्शवाद और शिक्षक 

आदर्शवाद शिक्षक को अत्यंत गौरवपूर्ण स्थान प्रदान करता है। शिक्षक की छत्रछाया में ही बालक का आध्यात्मिक विकास सम्भव है। फ्रोबेल ने बालक की उपमा एक पौधे से तथा शिक्षक की उपमा एक माली से देते हुए बताया कि जिस तरह माली पौधे को आवश्यकतानुसार सींचकर तथा काट-छांटकर सुव्यवस्थित रूप से पनपाता है जिससे वह एक सुन्दर एवं मनमोहक वृक्ष में ढल सके, उसी प्रकार शिक्षक का दायित्व भी बालक रूपी पौधे की उचित देखभाल करना है। शिक्षक के महत्व का वर्णन करते हुए रॉस लिखते हैं- एक प्रकृतिवादी केवल कांटों को देखकर ही सन्तुष्ट हो सकता है, परन्तु आदर्शवादी सुन्दर गुलाब का पुष्प देखना चाहता है। इसलिये शिक्षक अपने प्रयासों से बालक को, जो अपनी प्रकृति के नियमों के अनुसार विकसित होता है, उस उच्चता तक पहुंचाने में सहायता देता है, जहाँ तक वह स्वयं नहीं पहुँच सकता।"


(6) आदर्शवाद एवं बालक 

आदर्शवाद के अनुसार बालक केवल शरीर ही नहीं है बल्कि वह शरीर से भी बहुत ऊपर है। वस्तुतः आदर्शवादी बालक को मन एवं शरीर दोनों मानते है जिसमें मन अधिक महत्त्वपूर्ण है। आदर्शवादी शिक्षा में आदशों व विचारों को सबसे अधिक महत्त्व देते हैं और यही कारण है कि वे शिक्षा को बालकेन्द्रित नहीं मानते हैं। उनके अनुसार बालक में उच्च आदशों को स्थापित करने के लिये उनमें अन्तर्दृष्टि या सूत्र का विकास करना ही शिक्षा का प्रमुख कर्त्तव्य होना चाहिये। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि प्रकृतिवाद जहाँ शिक्षा को बाल-केन्द्रित बनाने में विश्वास रखता है वहाँ आदर्शवाद बालक को इस योग्य बनाने में विश्वास रखता है कि वह सूझ-बूझ के बल पर कठिन से कठिन चुनौतियों का स्वयं सामना कर सकें।


आदर्शवाद का मूल्यांकन 


आदर्शवाद का मूल्यांकन इसके गुण-दोषों के आधार पर निम्न प्रकार से किया जा सकता है


गुण 

आदर्शवाद के प्रमुख गुण निम्न हैं- 

1. आदर्शवादी शिक्षा के अन्तर्गत बालकों में 'सत्यम्, शिवम् और सुन्दरम् जैसे गुणों का विकास किया जाता है, इसके फलस्वरूप उनमें उत्कृष्ट चरित्र का निर्माण होता है।


2. आदर्शवादी शिक्षा इस अर्थ में अद्वितीय है कि इसमें शिक्षा के उद्देश्यों की विस्तृत व्याख्या के गई है।


3. आदर्शवादी शिक्षा में शिक्षक को गौरवपूर्ण स्थान दिया गया है। यह बालक और समाज दोनों के लिये मंगलमय है।


4. आदर्शवादी शिक्षा में बालक के व्यक्तित्व का आदर किया जाता है। यह शिक्षा उनकी रचना शक्तियों के विकास पर भी बल देती है।


5. यह शिक्षा आत्म-अनुशासन एवं आत्मनियन्त्रण के सिद्धान्तों को प्रतिपादित करती है। यह दमनात्मक अनुशासन का विरोध करता है।


6. आदर्शवादी दर्शन के परिणामस्वरूप विद्यालय एक सामाजिक संस्था बन गया है। इसीलिये व्यक्तिव एवं सामाजिक मूल्यों को समान महत्त्व दिया जाता है।


 दोष —

 आदर्शवाद में प्रमुख दोष निम्न हैं-

1. आदर्शवादी शिक्षा के उद्देश्य न केवल 'अमूर्त' हैं, वरन् इनका सम्बन्ध भी मात्र भविष्य से है। इस प्रकार यह शिक्षा सैद्धान्तिक अधिक है और व्यावहारिक कम ।


2. आदर्शवादी पाठ्यक्रम में आध्यात्मिक विषयों को ही प्रमुख स्थान दिया गया है जबकि आज के औद्योगिक युग में इनको आवश्यक नहीं समझा जाता । 


3. शिक्षण विधि के क्षेत्र में आदर्शवाद की कोई विशेष देन नहीं है। इसने कोई निश्चित शिक्षण विधि का प्रतिपादन नहीं किया है।


4. विचार और मन पर अधिक बल देने से इस शिक्षा में बौद्धिकता को आवश्यकता से अधिक महत्त्व दिया गया है।


5. यह शिक्षा शिक्षक को तो बहुत ऊँचा स्थान देती है, किन्तु इसमें बालक का स्थान गौण है।


6. आदर्शवाद हमें जीवन के अन्तिम ध्येय की ओर ले जाता है जिसकी हमें तात्कालिक आवश्यकता नहीं है। इस समय तो हमारी आवश्यकतायें रोटी, कपड़ा और मकान से ही मुख्य रूप से सम्बन्धित हैं।


प्रकृतिवाद (Naturalism)

 प्रकृतिवाद 


अर्थ - 

प्रकृतिवाद प्रकृति को मूल तत्त्व मानता है। यह अलौकिक और पारलौकिक को न मानकर प्रकृति को ही प्रमुख मानता है। इस दर्शन के अनुसार प्रत्येक वस्तु प्रकृति से जन्म लेती है और फिर उसी में विलीन हो जाती है। प्रकृतिवाद के अनुसार प्राकृतिक पदार्थ एवं क्रियाएँ ही सत्य हैं। प्रकृतिवादियों के अनुसार मनुष्य की अपनी एक प्रकृति होती है जो पूर्ण रूप से निर्मल होती है। इस प्रकृति के अनुकूल आचरण करने में उसे सुख तथा सन्तोष प्राप्त होता है तथा प्रतिकूल आचरण करने पर उसे दुःख और असन्तोष का अनुभव होता है। अतः उनके अनुसार मनुष्य को सदेव अपनी प्रकृति के अनुकूल ही आचरण करना चाहिये। दूसरे शब्दों में, प्रकृतिवादी मनुष्य को अपनी प्रकृति के अनुकूल आचरण करने की स्वतन्त्रता देते हैं तथा वे उसे किन्हीं सामाजिक बन्धनों या नियमों में जकड़कर रखना नहीं चाहते। उनका मत है कि मनुष्य उन्हीं कार्यों को करेगा जिन्हें करने में उसे सुख की प्राप्ति होगी तथा जिन्हें करने से उसे दुःख अनुभव होगा, उन्हें वह नहीं करना चाहेगा। इस प्रकार प्रकृतिवादी नैतिकता के पक्षधर हैं।


प्रकृतिवाद के समर्थकों में अरस्तू, काम्टे, हॉब्स, डार्विन, हरबर्ट स्पेन्सर, हक्सले, बेकन, लैमार्क तथा रूसो आदि दार्शनिकों के नाम मुख्य हैं।

प्रकृतिवाद की मुख्य परिभाषाएँ निम्न हैं-


1. थॉमस तथा लैंग (Thomas and Lang) - "प्रकृतिवाद, आदर्शवाद के विपरीत मन को पदार्थ के अधीन मानता है तथा यह विश्वास करता है कि अन्तिम वास्तविकता भौतिक है, आध्यात्मिक नहीं।"

"Naturalism is opposed to Idealism, subordinates mind to matter and holds that ultimate reality is material and not spiritual."


2. मॉरले (Morley) — "प्रकृतिवाद का सिद्धान्त है— सबसे प्रेम करना, मानव प्रकृति में पूर्ण विश्वास करना, न्याय की इच्छा करना तथा संतोष के साथ काम करना ताकि दूसरों का उपकार हो सके।" 


3. एनान (Anon) — "प्रकृतिवाद वह विचारधारा है जो मनुष्य तथा जगत को भौतिक, यान्त्रिक तथा जैविक दृष्टि से देखती है, यौगिक अथवा आभास की दृष्टि से नहीं।" 

"Naturalism is a system that views mom and universe as physical, mechanical and biological and not yogical or dehypnotical."


4. जॉयस (Joyce)- "प्रकृतिवाद वह विचारधारा है जिसकी प्रमुख विशेषता आध्यात्मिकता को अस्वीकार करना है अथवा प्रकृति एवं मनुष्य के दार्शनिक चिन्तन में उन बातों को स्थान देना है जो हमारे अनुभवों से परे नहीं है।

"Naturalism is a system whose salient characteristic is the exclusion of whatever is spiritual or indeed whatever is transcendental experience from our philosophy of nature and man."


प्रकृतिवाद के रूप 

(Forms of Naturalism)


प्रकृतिवाद के तीन प्रमुख रूप -


1. पदार्थवादी प्रकृतिवाद (Physical Naturalism) - इस वाद के अनुसार मानव प्रकृति द्वारा पूर्ण रूप से नियन्त्रित रहता है। इस वाद के अन्तर्गत भौतिक संसार तथा मानव के बाहरी  वातावरण का अध्ययन किया जाता है। यह मानव अनुभवों की व्याख्या प्राकृतिक नियमों द्वारा करता है |


2. यन्त्रवादी प्रकृतिवाद (Mechanical Naturalism) — इस वाद  के अनुसार सम्पूर्ण विश्व एक प्राण-विहीन तंत्र के समान है जिसका निर्माण पदार्थ तथा गति से हुआ है। यह वाद  मनुष्य  के चेतन तत्त्व की उपेक्षा करता है तथा मनुष्य को इस बड़े यन्त्र का एक पुर्जा मात्र मानता है।


3. जैविक प्रकृतिवाद (Biological Naturalism) - यह वाद डार्विन के विकासवादी सिद्धान्त पर आधारित है, जिसके अनुसार मानव का विकास पशुओं से हुआ है तथा यह इस विकास प्रक्रिया का सर्वोच्च रूप है। जीवन के लिये संघर्ष' तथा 'Survival of the Fittest' इसके दो प्रमुख सिद्धान्त है।


 प्रकृतिवादी शिक्षा की विशेषतायें 


प्रकृतिवादी शिक्षा की निम्नलिखित विशेषतायें है—


1. प्रकृति की ओर लौटो (Back to Nature ) — प्रकृतिवादियों का विश्वास है कि का स्वाभाविक विकास केवल प्राकृतिक वातावरण में ही हो सकता है न कि विद्यालय के कृत्रिम वातावरण में। उनके अनुसार प्रकृति ही बालक की महान शिक्षक है। 


2. पुस्तकीय शिक्षा का विरोध (Opposition of Bookish Knowledge)- प्रकृतिवादियों ने पुस्तकीय शिक्षा का विरोध किया है। उनके अनुसार प्रचलित शिक्षा व्यवस्था में पुस्तकों को रट लेते हैं जिससे उनका समय नष्ट होता है, मस्तिष्क कुण्ठित हो जाता है तथा उनको जन्मजात शक्तियां  स्वाभाविक रूप से विकसित नहीं हो पातीं। प्रकृतिवादियों के अनुसार मात्र पुस्तकें पढ़ा देना ही शिक्षा का कार्य नहीं है अपितु छात्र को स्वयं उसकी प्रकृति के अनुसार स्वयं विकसित होने के अवसर उपलब्ध कराये जाये। 


3. निषेधात्मक शिक्षा (Negative Education)—निषेधात्मक शिक्षा का अर्थ गलतियों में बचाने वाली शिक्षा से है। यह शिक्षा प्रकृति ही प्रदान कर सकती है। गलती करने पर प्रकृति बालक को दण्ड देवी है जैसे—आग को छूने पर बालक का हाथ जल  जाता है तथा यह फिर कभी आग को नहीं छूता।


4. बाल केन्द्रित शिक्षा (Child-centerd Education)-प्रकृतिवादीओ ने बालक को शिक्षा का केन्द्र बिन्दु माना। उन्होंने कहा कि बालक का अपना अस्तित्व होता है, उसकी प्रकृति साधु के समान होती है, उसकी इन्द्रियों का दमन नहीं किया जाना चाहिये। बालक की आयु के अनुसार ही उसकी शिक्षा की व्यवस्था की जानी चाहिये। अन्ततः शिक्षा बालक के लिये है, बालक शिक्षा के लिये नहीं।


5. स्वतन्त्रता (Freedom)- प्रकृतिवादी बालक की स्वतन्त्रता पर बल देता है। बालक को अपना विकास करने के लिये अपने भावों एवं विचारों को व्यक्त करने की स्वतन्त्रता होनी चाहिये। उसके समक्ष ऐसा स्वतन्त्र वातावरण प्रस्तुत किया जाना चाहिये ताकि उसका विकास स्वाभाविक रूप से हो सके। रूसो कहता है-मनुष्य पैदा तो स्वतन्त्र हुआ है लेकिन वह हमेशा दासता की बेड़ियों में जकड़ा रहता है। 


6. प्रगतिशीलता (Progressiveness) – प्रकृतिवादी बालक को एक गत्यात्मक प्राणी मानता है। यह प्राणी लगातार विकसित होता रहता है। शैशवावस्था, बाल्यावस्था, किशोरावस्था तथा प्रोविस्था ये बालक के विकास की चार अवस्थायें हैं। बालक की शिक्षा की व्यवस्था इन्हीं चार अवस्थाओं के अनुसार की जानी चाहिये। उनके अनुसार बालक से मनुष्य जैसा आचरण करने की अपेक्षा नहीं करनी चाहिये। रूसो कहता है, "प्रकृति चाहती है कि बालक मनुष्य बनने से पूर्व बालक ही रहे। यदि हम इस क्रम को बदलेंगे तो अगेते फल उत्पन्न करेंगे जिनमें न तो पकावट ही होगी और न ही गन्ध। 


7. बालक की इन्द्रियों के प्रशिक्षण पर बल (Training of Organs)- प्रकृतिवादी इन्द्रियों को ज्ञान का द्वार मानते हैं। ये कहते हैं कि ज्ञान को बेह्तर और प्रभावी बनाने के लिये बालक की इन्द्रियों का समुचित प्रशिक्षण आवश्यक  है |


प्रकृतिवाद एवं शिक्षा  


प्रकृतिवाद एवं शिक्षा के उद्देश्य 

प्रकृतिवादियों के अनुसार शिक्षा के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं-


1. वातावरण से अनुकूलन (Adjustment to Environment ) - प्रकृतिवादियों के अनुसार बालक में कुछ ऐसी जन्मजात शक्तियाँ होती हैं जिनके आधार पर वह अपने वातावरण के साथ अनुकूलन कर सकता है। अतः शिक्षा का उद्देश्य बालक में ऐसी शक्तियों का विकास करना है जो उसे अपने वातावरण के साथ अनुकूलन करने के योग्य बना सके।


2. बालक को संघर्षशील बनाना (To Prepare for Struggle) - डार्विन के अनुसार इस संसार में अपने अस्तित्त्व की रक्षा के लिये प्रत्येक प्राणी को निरन्तर संघर्ष करना पड़ता है, जो इसमें समर्थ होता है, उसी को विजय प्राप्त होती है। अतः शिक्षा का उद्देश्य बालक को संघर्षमय परिस्थितियों का सामना करने के योग्य बनाया जाना चाहिये।


3. बालक के जीवन को सुखी बनाना (To make the child Happy ) - प्रकृतिवाद के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य बालक में इस प्रकार की योग्यता एवं क्षमता का विकास करना है ताकि अपने वर्तमान जीवन को सुख एवं आनन्द के साथ व्यतीत कर सके। प्रकृतिवादी केवल वर्तमान की चिन्ता करते हैं, भविष्य की नहीं।


4. व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करना (All round Development )- प्रकृतिवाद के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति में कुछ रुचियाँ, योग्यताएं एवं क्षमतायें होती हैं। ये सभी शक्ति होती हैं। शिक्षा का उद्देश्य इन क्षमताओं को ठीक से विकसित करना है। दूसरे शब्दों में हम कहते हैं कि शिक्षा का एक मात्र उद्देश्य बालक के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करना है।


5. मूल प्रवृत्तियों का शोधन (Sublimation of Instincts ) - प्रकृतिवादियों के अनुसार व्यक्ति बाल्यावस्था में अपनी मूल प्रवृत्तियों से प्रेरित होकर कार्य करता है। इसी क्रिया के फल व्यक्ति सुख एवं दुःख का अनुभव करता है। दुःखदायक क्रिया को यह पुनः नहीं करता। अतः शिक्षा उद्देश्य बालक की मूल प्रवृत्तियों में सुधार लाकर उन्हें समाजोपयोगी बनाना है।


6. मानव एक कुशल यन्त्र (Man as a Machine )—प्रकृतिवादियों के अनुसार विश्व विराट यन्त्र है तथा मानव इसका एक भाग है। इन प्रकृतिवादियों का मानना है कि शिक्षा का मानव व्यवहार को इस प्रकार विकसित करना है ताकि वह एक कुशल यन्त्र की भाँति कार्य कर साथ ही, प्रकृतिवादी यह भी मानते हैं कि प्राणी स्वयं में पूर्ण भी है।


7. सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा करना (To Preserve Cultural Heritage) - प्रकृतिवादियों के अनुसार एक जाति द्वारा अर्जित की गई सभ्यता एवं संस्कृति वंशगत होती रहती है। शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य इस प्रकार विकसित की गई सभ्यता एवं संस्कृति में निरन्तर विकास करना है। 


प्रकृतिवाद एवं पाठ्यक्रम  -

 प्रकृतिवाद के अनुसार पाठ्यक्रम निम्नलिखि सिद्धान्तों पर आधारित होना चाहिये -


1. पाठ्यक्रम में विषयों का चयन बालक की प्रकृति, योग्यता, क्षमता एवं मूल प्रवृत्तियों में रखकर किया जाना चाहिये।

2. ऐसे विषयों को स्थान दिया जाये जो व्यावहारिक जीवन के लिये उपयोगी हों।

3. धार्मिक शिक्षा प्रदान करने वाले किसी भी विषय को पाठ्यक्रम में सम्मिलित नहीं किया जाना चाहिये।


प्रकृतिवाद एवं शिक्षण विधियाँ — 

प्रकृतिवादियों ने निम्न शिक्षण विधियों को अपनाने की सलाह दी है— करके सीखना (Learning by Doing), अनुभव द्वारा सीखना (Learning by Experience), खेल द्वारा सीखना (Learing by Play), प्रत्यक्ष विधि, डि विधि, पर्यटन, डाल्टन प्रणाली, निरीक्षण विधि, मॉण्टेसरी पद्धति आदि ।


प्रकृतिवाद एवं बालक -

 प्रकृतिवादी मानते हैं कि बालक स्वयं में एक पूर्ण इकाई है। वह योग्यता, रुचि आदि में अन्य बालकों से भिन्न होता है। अतः शिक्षा बालक की इन सभी योग्यताओं का विकास किया जाना चाहिये। प्रकृतिवाद बालक में श्रेष्ठता का दर्शन करता है तथा उसी का विकास करना चाहता है।


प्रकृतिवाद एवं शिक्षक - 

प्रकृतिवाद में प्रकृति को ही बालक का वास्तविक गुरु माना गया है। शिक्षक को इसमें गौड़़ स्थान प्रदान किया गया है। प्रकृतिवादियों के अनुसार शिक्षक का कार्य बालक के विकास के लिये समुचित परिस्थितियों का निर्माण करना है। अध्यापक की भूमिका स्टेज के समान एक डायरेक्टर की सी होती है , जो पर्दे के पीछे से ही अपनी भूमिका निभाता है।


प्रकृतिवाद एवं अनुशासन : 

रूसो के अनुसार बालक को कभी दण्ड नहीं दिया जाना चाहिये। गलती करने पर प्रकृति स्वयं उसे दण्ड देगी। जब बालक को किसी कार्य को करने से कष्ट अथवा दुःख महसूस होगा तो वह स्वयं ही उस कार्य को नहीं करेगा।


प्रकृतिवाद एवं विद्यालय —

वैसे तो प्रकृतिवादियों के अनुसार प्रकृति की गोद ही बालक का स्कूल है, फिर भी, यदि हमें सामाजिक विद्यालयों की स्थापना करनी ही पड़े तो ये विद्यालय प्राकृतिक नियमों पर आधारित होने चाहिये। भवन निर्माण ऐसा होना चाहिये कि इनमें प्राकृतिक वायु, प्रकाश आदि की समुचित व्यवस्था हो। साथ ही, विद्यालय का समय-विभाग-चक्र (Time Table) लचीला हो।


प्रकृतिवाद का शिक्षा में योगदान 


प्रकृतिवादी शिक्षा-सिद्धान्तों से शिक्षा के क्षेत्र में क्रान्तिकारी परिवर्तन हुए हैं एवं शिक्षाको दिशा मिली है, जो इस प्रकार है-


1. बाल मनोविज्ञान का विकास -प्रकृति ने बालक की प्रकृति के अनुसार शिक्षा की बात कहकर शिक्षा को मनोविज्ञान आधारित बना दिया। 


2. अनुभव-प्रधान पाठ्यक्रम पर बल —प्रकृतिवाद अनुभव-प्रधान पाठ्यक्रम का समर्थन करता है जिसके अनुसार पाठ्यक्रम में बालक के अनुभवों को सम्मिलित किया जाता है तथा पाठ्य सहगामी क्रियाओं पर विशेष बल दिया जाता है। 


3. शिक्षण पद्धतियों के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण देन —प्रकृतिवाद ने बालक को उसकी प्रकृति के अनुसार विकसित करने पर बल दिया जिनके परिणामस्वरूप शिक्षण पद्धतियों के क्षेत्र में क्रान्तिकारी परिवर्तन हुए। विभिन्न शिक्षण पद्धतियाँ; जैसे—यूरिस्टिक पद्धति, डाल्टन पद्धति, निरीक्षण पद्धति, खेल पद्धति तथा मॉण्टेसरी पद्धति प्रकृतिवाद की ही देन हैं।


4. अनुशासन के क्षेत्र में दमन का निषेध —प्रकृतिवाद ने विद्यालयों में बालकों को दिये जाने वाले शारीरिक दण्ड का विरोध कर, बालक के लिए स्वाभाविक वातावरण में शिक्षा का प्रावधान कर शिक्षा को आनन्ददायक बनाया जिससे बालक उत्साहपूर्वक अधिकाधिक सीख सकें।


5. वैज्ञानिकता को शिक्षा में प्रधानता - प्रकृतिवादियों ने ज्ञान का प्रमुख स्रोत विज्ञान को माना। परिणामतः विज्ञान के विषयों को पाठ्यक्रम में प्रमुख एवं महत्त्वपूर्ण स्थान मिला। इस तरह शिक्षा को वैज्ञानिक स्वरूप प्रदान करने में सहायता मिली। 


6. विषय के स्थान पर बालक को प्रमुखता या बाल केन्द्रित शिक्षा —परम्परागत शिक्षा-प्रणाली में विषय-प्रधान शिक्षा होने के कारण बालक उपेक्षित रह जाता था। उसका सम्यक संतुलित विकास नहीं हो पाता था। अतः बालक केन्द्रित शिक्षा के प्रवर्तन से शिक्षा-क्षेत्र में सभी दृष्टियों से बहुत लाभ हुआ है। कहने का तात्पर्य यह है कि प्रकृतिवाद बाल-केन्द्रित शिक्षा (Child-centred) पर अधिक बल देता है न कि पाठ्य-वस्तु केन्द्रित (Teacher-centred) अय्या अध्यापक केन्द्रित शिक्षा (Teacher centred) अर्थात्, हमारी सम्पूर्ण शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया का केन्द्र बिन्दु छात्र होना चाहिये न कि कोई और। 

April 06, 2023

शिक्षा : अर्थ, स्वरूप एवं प्रकार (EDUCATION : MEANING, NATURE AND MODES )

शिक्षा : अर्थ, स्वरूप एवं प्रकार 

(EDUCATION : MEANING, NATURE AND MODES )


       शिक्षा का अर्थ 
(Meaning of Education)

'शिक्षा' शब्द संस्कृत भाषा की 'शिक्ष' धातु में प्रत्यय लगाने से बना है। 'शिक्ष' का अर्थ है सीखना और सिखाना । अतः 'शिक्ष' शब्द का शाब्दिक अर्थ हुआ-सीखने व सिखाने की क्रिया'शिक्षा' शब्द के लिए अंग्रेजी में 'ऐजुकेशन' (Education) शब्द का प्रयोग किया जाता है। ऐजुकेशन शब्द लैटिन भाषा के 'ऐजुकेटम' (Educatum) शब्द से विकसित हुआ है तथा 'ऐजुकेटम' शब्द इसी भाषा के ए (E) तथा इयूको (Duco) शब्दों से मिलकर बना है। (E) का अर्थ है— अंदर से, जबकि इयूको (Duco) का अर्थ है-आगे बढ़ाना। अतः 'ऐजुकेशन' शब्द का अर्थ है—अंदर से आगे बढ़ाना | प्रश्न यह उठता है कि अंदर से आगे बढ़ाने से क्या तात्पर्य है? वास्तव में प्रत्येक बालक के अंदर जन्म के समय कुछ जन्मजात शक्तियाँ बीज रूप में विद्यमान रहती हैं। उचित वातावरण के सम्पर्क में आने पर ये शक्तियाँ विकसित हो जाती हैं, जबकि उचित वातावरण के अभाव में ये शक्तियाँ या तो पूर्णरूपेण विकसित नहीं हो पाती है अथवा अवांछित रूप ले लेती हैं। शिक्षा के द्वारा व्यक्ति की जन्मजात शक्तियों को अंदर से बाहर की ओर उचित दिशा में विकसित करने का प्रयास किया जाता है। दूसरे शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि 'ऐजुकेशन' शब्द का प्रयोग व्यक्ति या बालक की आन्तरिक शक्तियों को बाहर की ओर प्रकट करने अथवा विकसित करने की क्रिया के लिए किया जाता है। लेटिन के 'ऐजुकेयर' (Educare) तथा 'ऐजुशियर' (Educere) शब्दों को भी 'ऐजुकेशन' शब्द के मूल के रूप में स्वीकार किया जाता है। इन दोनों शब्दों का अर्थ भी आगे बढ़ाना (To Bring Up), बाहर निकालना (To Lead Out) अथवा विकसित करना (To Raise) है। स्पष्ट है कि शिक्षा तथा इसके अंग्रेजी पर्यायवाची 'ऐजूकशन' (Education) दोनों ही शब्दों का शाब्दिक अर्थ मनुष्य की आन्तरिक शक्तियों को आगे बढ़ाने वाली, विकसित करने वाली अथवा इनका वाह्य प्रस्फुटन करने वाली प्रक्रिया है। अतः निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि शिक्षा शब्द का अर्थ जन्मजात शक्तियों का सर्वागीण विकास करने की प्रक्रिया से है।

शिक्षा के शब्द के वास्तविक अर्थ को समझने के लिए विभिन्न विद्वानों के द्वारा शिक्षा के अर्थ के सम्बन्ध में प्रकट किए गए विचारों का अवलोकन करना आवश्यक होगा।

स्वामी विवेकानन्द मनुष्य को जन्म से पूर्ण (Perfect स्वीकार करते थे तथा उनके अनुसार शिक्षा का उद्देश्य उसकी पूर्णता को प्रस्फुटित करना था। उनके शब्दों में- "मनुष्य की पूर्वनिहित पूर्णता को अभिव्यक्त करना शिक्षा है।" 
"Education is manifestation of perfection already present in man."
                                                                                                -Swami Vivekanand


राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने शिक्षा को व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक एवं आध्यामिक विकास                       की प्रक्रिया के रूप में स्पष्ट किया। उनके शब्दों में - "शिक्षा से मेरा अभिप्राय बालक तथा मनुष्य,शरीर, मस्तिष्क तथा आत्मा के सर्वागीण सर्वोत्तम विकास से है। "

"By Education I mean an all round drawing out of the best in child and man-body, mind and spirit."       -Mahatma Gandhi

प्रसिद्ध यूनानी दार्शनिक सुकरात के अनुसार - "शिक्षा का अर्थ उन सर्वमान्य विचारो को         विकसित करना है जो प्रत्येक मनुष्य के मस्तिष्क में विलुप्त है।" 

"Education means the bringing out of the ideas of universal validity which are learnt in the mind of everyman."            -Socrates

अरस्तू ने शारीरिक तथा मानसिक विकास पर बल देते हुए कहा था कि - "स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मस्तिष्क का निर्माण करना ही शिक्षा है।" 

"Education is the creation of a sound mind in a sound body."        -Aristotle

हरबर्ट स्पेन्सर ने मनुष्य जीवन की वास्तविक परिस्थितियों से तालमेल बैठाने पर बल देते हुए कहा कि - "शिक्षा से तात्पर्य अन्तर्निहित शक्तियों तथा बाह्य जगत के मध्य समन्वय स्थापित करने से है।" 

"Education means establishment of co-ordination between the inherent powers and the outer world."             -Herbert Spencer

जॉन डयूवी के शब्दों में- "शिक्षा, व्यक्ति की उन समस्त क्षमताओं का विकास करना है जो उसे अपने वातावरण को नियंत्रित करने तथा अपनी सम्भावनाओं को पूरा करने योग्य बनाएगी।" 

"Education is the development of all those capacities in the individuals which will enable him to control his environment and fulfill his possiblities."      -John Dewey

जर्मन शिक्षाशास्त्री पेस्टालॉजी ने जन्मजात शक्तियों के विकास के रूप में शिक्षा को परिभाषित करते हुए कहा है कि- "शिक्षा व्यक्ति की समस्त जन्मजात शक्तियों का स्वाभाविक, समरस तथा प्रगतिशील विकास है।"

 "Education is a natural, harmonious and progressive development of man's innate powers."                                                                                                                                    -Pestalozzi

प्लेटो—“शारीरिक, मानसिक तथा बौद्धिक विकास की प्लेटो—“शारीरिक, मानसिक तथा बौद्धिक विकास की प्रक्रिया ही शिक्षा है।"

 "Education is a process of physical, mental & intellectual development."         -Plato

ट्रो- शिक्षा, नियंत्रित वातावरण में मानव विकास की प्रक्रिया है।"
"Education is human development in a controlled environment."               -Trow

पेस्तालॉजी के शिष्य फ्रोबेल ने शिक्षा को निम्न शब्दों में पारिभाषित किया है - "शिक्षा वह प्रक्रिया है, जिसके द्वारा बालक अपनी आन्तरिक शक्तियों को   वाह्य  शक्तियों का रूप देता है।" 

"Education is a process by which the child makes its internal external."      -Froebel

मेकेन्जी के शब्दों में - "व्यापक अर्थ में शिक्षा एक ऐसी प्रक्रिया है जो जीवन-पर्यन्त है तथा जो जीवन के प्रत्येक अनुभव से संबंधित होती है।" 

"In wider sense, it is a process that goes on throughout life and is promoted by almost every experience in life."      -S. S. Mackenzi



भारतीय संप्रत्यय  (Indian Concept)


“शिक्षा का अन्तिम लक्ष्य निर्वाण है।"        - उपनिषद्
   
"Education is that whose end product is salvation."     -Upnishads

“शिक्षा स्वयं की अनुभूति है।"         - शंकराचार्य

"Education is the realization of the self."       -Shankracharya


आधुनिक संप्रत्यय   (Modern Concept) 

"शिक्षा अन्तर्निहित ज्योति की उपलब्धि के लिये विकासशील आत्मा की प्रेरणादायिनी शक्ति है।"- अरविन्द घोष

"Education is helping the growing soul to draw out that is in itself."     -Aurobindo Ghosh


"शिक्षा का अर्थ बालक को इस योग्य बनाना है कि वह शाश्वत सत्य की खोज कर सके, उसे अपना बना सके, और उसकी अभिव्यक्ति कर सके।"             - टैगोर

"Education means to enable the child to find out the ultimate truth...... making truth its own and giving expression to it."     -R.N. Tagore 


"शिक्षा चैतन्य रूप में एक नियंत्रित प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति के व्यवहार में परिवर्तन लाये जाते हैं और व्यक्ति के द्वारा समूह में।"        - ब्राउन


"Education is the consciously controlled process whereby changes in behaviour are produced in the person and through the person within the group."       -Brown 


शिक्षा की विशेषताएँ
(Characteristics of Education)


"Plants are developed by cultivation and man by Education."     -Locke 

शिक्षा की उपरोक्त परिभाषाओं के विश्लेषण के आधार पर शिक्षा की अधोलिखित विशेषताएं कही जा सकती हैं-

1. शिक्षा केवल विद्यालयों में प्रदत्त ज्ञान तक ही सीमित नहीं है। 
   (Education is not limited to knowledge imparted in schools)

2. शिक्षा एक जीवन पर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया है।
   (Education is a life-long process).

3. शिक्षा बच्चे की अन्तर्निहित शक्तियों का विकास करती है। 
   (Education Develops the inherent powers of a child.)

4. शिक्षा एक गत्यात्मक प्रक्रिया है। 
    ( Education is a dynamic process.)

5. शिक्षा एक द्विध्रुवीय  प्रक्रिया है। 
    (Education is a Bi-polar process.)

6. शिक्षा एक त्रिचुची प्रक्रिया है।
   (Education is a Tri-polar process.)

7. शिक्षा व्यवहार में सुधार तथा चरित्र-निर्माण की प्रक्रिया है। 
   (Education is a process of modifying behaviour and character formation.)

8. शिक्षा एक प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष दोनों प्रकार की प्रक्रिया है।
   (Education is a Direct and Indirect process both.) 

9. अनुभवों में संवर्धन में सहायक।
   (Enrichment of Experiences.)

10. व्यक्ति के व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास में सहायक। 
   (All round development of the individual.)

11. वातावरण से समायोजन की प्रक्रिया। 
   (A process of adjustment with the environment.)


द्विध्रुवीय प्रक्रिया के रूप में शिक्षा 
(Education as a Bi-polar Process)


जैसा कि पहले बताया गया है, शिक्षा एक प्रक्रिया है, न कि एक आदेश (prescription)। इस प्रक्रिया में दो व्यक्ति सम्मिलित होते हैं—शिक्षक और शिक्षार्थी। दोनों के मध्य पारस्परिक क्रिया होती है, उनके प्रयत्नों का परिणाम शिक्षा होती है। इस प्रकार शिक्षा एक 'सहभागी गतिविधि या अनुभवों का साझा करना बन जाती है। एडम्स (Adams) इसे द्विध्रुवीय प्रक्रिया कहते हैं। "इस प्रक्रिया में शिक्षक और विद्यार्थी के मध्य निरंतर पारस्परिक क्रिया होती रहती है और दो ध्रुवों की पारस्परिक क्रिया की भाँति दो व्यक्तियों का परस्पर प्रभाव होता है। इस प्रकार शिक्षा एक संचेतन (conscious) और सोची-समझी प्रक्रिया बन जाती है जिसमें सम्प्रेषण (communication) और ज्ञान के परिचालन (manipulation) द्वारा एक व्यक्तित्त्व दूसरे व्यक्तित्त्व के विकास में परिवर्तन लाने के लिए उस पर कार्य करता है। एक बालक भी शिक्षण और अधिगम प्रक्रिया में एक सक्रिय सहभागी होता है। Ross लिखते हैं, “एक चुम्बक की भाँति शिक्षा के अवश्य ही दो ध्रुव होने चाहिएं।" (Like magnet education must have two poles).

शिक्षा की दो-ध्रुवीय प्रकृति के बारे में विवेचन करते हुए एडम्स (Adams) शिक्षा की प्रक्रिया के दो पक्षों, व्यक्तिनिष्ठ (subjective) और विषयपरक (objective) के बारे में बताते हुए कहते हैं कि उनके विचार में, शिक्षा तब व्यक्तिनिष्ठ बन जाती है जब शिक्षार्थी शिक्षक की सत्ता पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगाता है और सीधे उसके द्वारा दिए गए उद्दीपनों (stimuli) के प्रति प्रतिक्रिया व्यक्त करता है। सामान्यतः ऐसा ही होता है। दूसरी ओर शिक्षा तब विषयपरक (objective) बन जाती है जब शिक्षार्थी शिक्षक के प्रयोजनों को समझता है और कभी-कभी अपने विवेक का प्रयोग कर उसे चुनौती देता है या उसका विरोध भी करता है। ऐसा कभी कभार ही होता है। इसलिए एडम्स कहते हैं, "अधिकतर विद्यार्थियों के अनुभव में शिक्षा व्यक्तिनिष्ठ और विषयपरक, दोनों क्षेत्रों में पूरे समय दो-ध्रुवीय रहती है।"

अध्यापक- ध्रुव    →  एक व्यक्तित्त्व दूसरे व्यक्ति के विकास को परिवर्तित करने के लिए उस पर क्रिया करता है। 


शिक्षा दो ध्रुवीय   →  प्रक्रिया सचेतन (conscious) और सोची-समझी भी होती है।
 होती है।


छात्र-ध्रुव          →    शिक्षक  के व्यक्तित्त्व और ज्ञान के इस्तेमाल का सीधा प्रभाव अध्यापक से छात्र की ओर प्रवाहित ज्ञान दोनों को जोड़ता है। इसका साधन परस्पर परिचर्चा है।  



त्रि- ध्रुवीय प्रक्रिया के रूप में शिक्षा 
(Education as a Tri-Polar Process)


शिक्षा के आधुनिक मत को 'तीन-आयामी' कहा जाता है। यह बताया जाता है कि सम्पूर्ण शिक्षा समाज में और सामाजिक व्यवस्था में घटती है। J.E. Adamson ने शिक्षा के तीन-ध्रुवीय सिद्धान्त को प्रस्तुत किया। उनके अनुसार शिक्षा का सार बालक व बालक के संसार के मध्य समायोजन है। समायोजन की प्रक्रिया सक्रिय और निष्क्रिय, दोनों प्रकार की होती है। बालक अपने वातावरण द्वारा प्रभावित होता है और साथ ही  वह वातावरण को प्रभावित करता है और उसे आकार देता है। 


शिक्षा के प्रकार 
(Forms of Education)


शिक्षा जीवन पर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया है। यह औपचारिक, अनौपचारिक तथा निरोपचारिक के रूप में जन्म से लेकर मृत्यु तक चलती रहती है। यह एक व्यापक संप्रत्यय है जिसमें विभिन्न स्रोतों जैसे रेडियो, समाचारपत्र, टेलीविजन, शिक्षा संस्थाओं आदि से प्राप्त ज्ञान को सम्मिलित किया जाता है। एक सामान्य व्यक्ति इसे शिक्षा संस्थाओं में प्राप्त शिक्षा के रूप में ही समझता है जो निश्चित रूप से अन्य स्रोतों से प्राप्त शिक्षा से सर्वथा भिन्न है। शिक्षा शास्त्रियों ने शिक्षा के निम्नलिखित प्रकारों का वर्णन किया है-

1. सामान्य शिक्षा (General Education ) — शिक्षा का प्रमुख कार्य माध्यमिक स्तर तक बालक को सामान्य शिक्षा प्रदान करना है और यही हम शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य भी मानते हैं। यह शिक्षा का निम्नतम स्तर है जो प्रत्येक व्यक्ति के लिए अपनी विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिए आवश्यक होता है। यह बालक को उचित व्यवहार करने के योग्य बनाती है। इसका उद्देश्य बालक की सामान्य योग्यताओं का विकास करना है ताकि उसके व्यक्तित्व का विकास हो सके तथा वह वातावरण में समायोजन के योग्य बन सके। भारत में स्वतंत्रता के पश्चात् सर्व शिक्षा को मुक्त तथा आवश्यक बना दिया गया है।

2. विशिष्ट शिक्षा (Specific Education) - वर्तमान युग विशिष्टीकरण का युग है। एक व्यक्ति सभी क्षेत्रों में विशिष्ट नहीं हो सकता। यदि बालक को उसके जन्मजात गुणों, योग्यताओं तथा क्षमताओं के अनुरूप विशिष्ट शिक्षा प्रदान की जाए तो उसे अपनी योग्यताओं के विकास के लिए उत्तम अवसर प्राप्त होंगे। इसका उद्देश्य एक व्यक्ति को किसी एक विशेष कौशल में कुशल में कुशल बनाना है। यह समाज के प्रत्येक क्षेत्र में विशिष्ट प्रशिक्षित व्यक्ति प्रदान करती है। इस प्रकार यह राष्ट्र के विकास के साथ-साथ उसके कल्याण में भी सहायक होती है। यह विशिष्ट संस्थाओं में जैसे मेडिकल महाविद्यालयों, इंजीनियरिंग महाविद्यालय, तकनीकी संस्थाओं, प्रबन्धन संस्थाओं, कम्प्यूटर केन्द्रों आदि में प्रदान की जाती है।

3. प्रत्यक्ष शिक्षा (Direct Education ) - इस प्रकार की शिक्षा में शिक्षक तथा शिक्षार्थी में प्रत्यक्ष सम्बन्ध होता है। शिक्षक के व्यक्तित्व का प्रत्यक्ष प्रभाव विद्यार्थी पर पड़ता है। जहाँ विद्यार्थियों की संख्या बहुत अधिक हो जाती है वहाँ यह शिक्षा सम्भव नहीं होती क्योंकि ऐसी कक्षा में अध्यापक के लिए प्रत्येक विद्यार्थी के साथ मधुर सम्बन्ध बनाए रखना कठिन हो जाता है। यही कारण है कि आज के समय में कक्षा के आकार को छोटा रखने पर बल दिया जाता है।

4. अप्रत्यक्ष शिक्षा (Indirect Education) — वर्तमान युग में अप्रत्यक्ष शिक्षा अस्तित्व में आई क्योंकि जन संचार के विकास के कारण महान शिक्षाशास्त्रियों के विचारों को उन लोगों तक पहुँचाना सम्भव हो गया है जो इन लोगों के प्रत्यक्ष सम्बन्ध में कभी नहीं आए। इंदिरा गाँधी मुक्त विश्वविद्यालय पूरे विश्व में विभिन्न क्षेत्रों में अप्रत्यक्ष शिक्षा प्रदान कर रहा है। बहुत से अन्य विश्वविद्यालय भी दूरस्थ शिक्षा कार्यक्रम चला रहे हैं। उच्च स्तर पर रेडियो, टेलीविजन आदि शिक्षण के लिए अधिक प्रसिद्ध हो रहे हैं। आज के समय में कोई भी व्यक्ति यदि इंटरनेट की सहायता से सूचना प्राप्त करना चाहता है, कर सकता है। इस प्रकार की शिक्षा पश्चिम में अधिक प्रसिद्ध होती जा रही है।

5. व्यक्तिगत शिक्षा (Individual Education)- मनोवैज्ञानिक रूप से यह सिद्ध हो चुका है कि सभी व्यक्ति एक जैसे नहीं होते हैं, इसलिए इस बात पर बल दिया जा रहा है कि शिक्षक को व्यक्तिगत रूप से प्रत्येक बालक का ध्यान रखना चाहिए। रवीन्द्रनाथ टैगोर के द्वारा शान्तिनिकेतन में किया गया प्रयोग सफल सिद्ध हुआ है, परन्तु यदि इसे बड़े पैमाने पर शिक्षा विधि के रूप में अपनाया जाए तो यह पूर्ण रूप से अव्यावहारिक होगी। प्राथमिक स्तर पर किन्डरगार्डन पद्धति, मॉन्टेसरी पद्धति बच्चे पर व्यक्तिगत रूप से ध्यान देने की उच्च पद्धतियों है।

6. सामूहिक शिक्षा (Collective Education) - जैसा कि नाम से ही विदित होता है कि यह शिक्षा एक स्थान पर सामूहिक रूप से इकट्ठे हुए व्यक्तियों को दी जाने वाली शिक्षा है। एक अध्यापक जब एक से समय पर एक बहुत बड़ी संख्या में विद्यार्थियों को शिक्षा देता है तो ऐसी शिक्षा समय तथा धन के क्षेत्र में मितव्ययी बन जाती है। भारत की जनसंख्या जिस गति से बढ़ती जा रही है ऐसी परिस्थितियों में यही शिक्षा उपयुक्त मानी जाती है।

7. संकुचित शिक्षा (Narrow Education)—यह विद्यालय तथा विश्वविद्यालय शिक्षा तक सीमित है। जब बालक शिक्षा संस्था में प्रवेश लेता है, तब से यह आरम्भ होती है तथा शिक्षा संस्था छोड़ने पर समाप्त हो जाती है। यह आकस्मिक न होकर नियोजित होती है। इसमें अध्यापक तथा विद्यार्थी में प्रत्यक्ष सम्बन्ध होता है। इस प्रकार की शिक्षा का क्षेत्र अत्यन्त संकुचित होता है।

8. व्यापक शिक्षा (Wider Education ) - यह एक जीवन पर्यन्त चलने वाली शिक्षा है। यह जन्म से प्रारम्भ होकर जीवन भर चलती रहती है। इसमें शिक्षा के सभी अभिकरणों औपचारिक, अनीपचारिक तथा निरोपचारिक से प्राप्त अनुभव सम्मिलित होते हैं। समाज का प्रत्येक सदस्य एक समय में अध्यापक के रूप में तथा दूसरे समय में विद्यार्थी के रूप में कार्य करता है। इस प्रकार की शिक्षा का क्षेत्र अत्यन्त व्यापक होता है।

9. औपचारिक शिक्षा (Formal Education ) - औपचारिक शिक्षा वह शिक्षा है जो कुछ निश्चित उद्देश्यों तथा आदशों के अनुरूप संगठित होती है। यह एक विशेष समय अवधि के लिए, विशेष समय पर, निश्चित पाठ्यक्रम के अनुसार बालक को औपचारिक ढंग से प्रदान की जाती है। शिक्षा देने का कार्य विशेष क्षेत्र में विशिष्ट व्यक्तियों को प्रदान किया जाता है। इस क्षेत्र में बालक को सामान्य, विशिष्ट एक व् तथा प्रत्यक्ष शिक्षा प्रदान की जाती है। इस प्रकार की शिक्षा विद्यार्थी औपचारिक संस्थाओं में प्राप्त करता है। शिक्षा क्रमबद्ध रूप से प्रदान की जाती है। इस प्रकार की शिक्षा समाज तथा व्यक्ति की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए प्रदान की जाती है। इस प्रकार की शिक्षा एक ही समय में बड़ी संख्या में विद्यार्थियों शिक्षा को वैज्ञानिक ढंग से तथा सतत् प्रदान की जा सकती है।


10. अनौपचारिक शिक्षा (Informal Education)—यह औपचारिक शिक्षा की पूरक है जिसके बिना शिक्षा अपूर्ण है। यह प्राकृतिक तथा आकस्मिक होती है। इसके परिणामस्वरूप बिना किसी साथ समझे प्रयास के व्यवहार में अचानक तथा आवश्यक रूप से परिवर्तन आता है। यह एक जीवन पर्यन्त प्रक्रिया है जिसमें सभी अनौपचारिक शिक्षा प्राप्त करने के योग्य हैं। इसके लिए कोई आयु निश्चित नहीं होती। इसमें स्थान तथा समय निश्चित नहीं होता। इस प्रकार की शिक्षा में कोई पूर्व निश्चित पाठ्यक्रम तथा उद्देश्य नहीं होते। चालक अनुभवों से सीखता है तथा इसके द्वारा प्राप्त ज्ञान औपचारिक शिक्षा की अपेक्षा अधिक स्थायी रहता है। ऐसी शिक्षा किसी संगठित अभिकरण के द्वारा प्रदान नहीं की जाती। इसको बनाने के लिए वित्तीय साधनों की आवश्यकता नहीं होती।

11. निरोपचारिक शिक्षा (Non-formal Education)- औपचारिक तथा अनौपचारिक दोनो यह औपचारिक तथा अनौपचारिक शिक्षा के बीच की कड़ी है। इसका मुख्य केन्द्र बिन्दु विद्यालय से बाहर की दुनिया है तथा इसके कार्यों में जन शिक्षा, कौशलों, तकनीकों तथा जीवन शैली में सुधार के लिए शिक्षा सम्मिलित की जाती है। वैज्ञानिक तथा तकनीकी विकास के फलस्वरूप ज्ञान में विस्फोट के कारण इस संप्रत्यय का विकास शिक्षा के विकास पर अन्तर्राष्ट्रीय समिति की रिपोर्ट 'लर्निंग टू बी' के प्रकाशन के पश्चात् हुआ। इस समिति के द्वारा यह महसूस किया गया कि शिक्षा पर इतने वित्तीय साधनों के खर्च करने के पश्चात् भी जनसंख्या का एक बहुत बड़ा भाग शिक्षा से वंचित रह जाता है। वे जीविका कमाने में व्यस्त रहते हैं, इसीलिए वे निश्चित समय में औपचारिक शिक्षा संस्थाओं में प्राप्त नहीं कर सकते। इसीलिए समिति के द्वारा यह सुझाव दिया गया कि ऐसे लोगों के लिए, जो शिक्षा प्राप्त करने के इच्छुक हैं, अवकाश के समय में उचित शिक्षा का प्रबन्ध किया जाना चाहिए।

भारत में इस प्रकार की शिक्षा अत्यावश्यक है। परिणामस्वरूप बहुत से कार्यक्रम जैसे-प्रौढ़ शिक्षा, पत्राचार शिक्षा, मुक्त विश्वविद्यालय से शिक्षा आदि प्रारम्भ किए गए हैं। उनके उद्देश्य समाज के प्रत्येक वर्ग का सामाजिक तथा आर्थिक विकास करना है। यह जीवन केन्द्रित तथा वातावरण आधारित है तथा व्यक्तियों को भविष्य में परिवर्तन के लिए तैयार करती है।

September 25, 2022

पाठ्यक्रम का क्षेत्र, कार्य , आवश्यकता तथा पाठ्यक्रम को प्रभावित करने वाले घटक (Curriculum's Scope, Function, Need and Factors Influencing the Curriculum)

Utkarsh Education



 
पाठ्यक्रम का क्षेत्र 
(Scope of Curriculum)

पाठ्यक्रम के द्वारा ही शिक्षा के उद्देश्यों की प्राप्ति की जाती है अतः शिक्षा नियोजन के लिए पाठ्यक्रम आवश्यक है। इसकी उपयोगिता अधोलिखित है

1. शिक्षा के उद्देश्य की प्राप्ति (Achievement of the Aims of Education)- शिक्षा की व्यवस्था पाठ्यक्रम पर आधारित होती है। जब तक पाठ्यक्रम का सही नियोजन नहीं किया जाता तब तक शिक्षा के उद्देश्यों की प्राप्ति नहीं हो सकती, क्योंकि पाठ्यक्रम का स्वरूप शिक्षा के उद्देश्यों के अनुसार निर्मित होता है।

2. शिक्षा प्रक्रिया का व्यवस्थीकरण (Organisation of Educational Process) - पाठ्यक्रमः एक ऐसा लेखा-जोखा है जिससे यह स्पष्ट रूप से अंकित किया जाता है कि शिक्षा के किस जीवन स्तर पर विद्यालयों में कौन-सी क्रियाओं की तथा कौन से विषयों की शिक्षा दी जायेगी। इस प्रकार पाठ्यक्रम विद्यालयी कार्यक्रम की रूपरेखा बनाता अथवा शिक्षा की प्रक्रिया को व्यवस्थित करता है।

3. क्या और कैसा ज्ञान (What and how much) - पाठ्यक्रम अध्यापकों के लिए अत्यन्त उपयोगी है। बिना इसके वे यह नहीं जान सकते कि उन्हें क्या और कितना ज्ञान बालकों को देना है? पाठ्यक्रम के आधार पर ही वे ठीक प्रकार से काम करते हैं और उन्हें यह मालूम रहता है कि एक निश्चित अवधि के अन्दर उन्हें अमुक कक्षा में कितना कार्य समाप्त करना है।

4. समय एवं शक्ति का प्रयोग (Proper use of Time and Energy) - पाठ्यक्रम से अध्यापकों को यह ज्ञात रहता है कि उन्हें क्या सिखाना है और कितने समय में सिखाना है? इसी प्रकार छात्रों को भी यह ज्ञान रहता है कि उन्हें क्या सीखना है और कितने समय में सीखना है। इसी प्रका शिक्षा और छात्र दोनों ही एक निश्चित समय के अन्दर कार्य पूरा करते हैं। अतः इसके द्वारा समय एवं शक्ति का सदुपयोग होता है।

5. ज्ञानोपार्जन (Acquisition of Knowledge)- ज्ञानोपार्जन करने में पाठ्यक्रम बालकों को सहायता करता है। यह सही है कि ज्ञान एक है, परन्तु मनुष्य ने अपनी सुविधा के लिए इसके कई भा कर लिए हैं; जैसे—साहित्य, गणित, विज्ञान, सामाजिक विषय इत्यादि। ज्ञान के इन विभिन्न भाग के ज्ञानार्थ पाठ्यक्रम की रचना की जाती है।

6. चारित्रिक विकास (Development of Character) - चारित्रिक विकास की दृष्टि से शिक्षा इस बात पर बल देती है कि बालकों के अन्दर मानवीय गुणः जैसे-सत्य, सेवा, त्याग, परोपकार सद्भावना इत्यादि उत्पन्न किए जाएं। यह कार्य पाठ्यक्रम के द्वारा ही पूर्ण होता है। इन गुणों का विकसित करके इन्हीं के अनुसार बालकों से आचरण करवाना पाठ्यक्रम का उद्देश्य है।

7. पाठ्यपुस्तकों का निर्माण (Preparation of Text Books)- पाठ्यक्रम के आधार पर ही पाठ्यपुस्तकों की रचना की जाती है। पाठ्यपुस्तकों में वही सामग्री रखी जाती है जो किसी स्तर के पाठ्यक्रम के अनुकूल हो । पाठ्यक्रम न होने पर पुस्तकों में अनावश्यक बातें भी सम्मिलित हो सकती है। पाठ्यक्रम इस स्थिति से हमारी रक्षा करता है।

8. मूल्यांकन में सरलता (Easy Evaluation)— किसी कक्षा स्तर के पाठ्यक्रम के आधार पर ही उस कक्षा के छात्रों की योग्यता का मूल्यांकन सम्भव होता है। पाठ्यक्रम के अभाव में मूल्यांकन कठिन होगा।

9. नागरिकों का निर्माण (Preparation of Citizens)— शिक्षा का उद्देश्य उपयोग एवं आदर्श नागरिकों का निर्माण करना है। आदर्श एवं उपयोगी नागरिक वहीं है जिसकी शक्तियाँ पूर्णरूप से विकसित हो, जो कानून का पालन करें, न्यायानुकूल आचरण करें और जिसमें स्वतन्त्र चिन्तन और निर्माण की शक्तियाँ शामिल हों, इन बातों की क्षमता एवं योग्यता उत्पन्न करने के लिए ही पाठ्यक्रम का निर्माण होता है।

10. अन्वेषकों की उत्पत्ति (Origin of Discoverer)—– पाठ्यक्रम ऐसे ज्ञान पिपासुओं तथा विद्वानों को जन्म देता है जो अध्ययन, उद्योग एवं शोधकार्य, ज्ञान में वृद्धि करते हैं। सामाजिक परिवर्तन के साथ समस्याओं के लिए शोध अध्ययनों की आवश्यकता है।

पाठ्यक्रम के कार्य
 (Functions of Curriculum)

शिक्षा की प्रक्रिया के तीन घटक होते हैं— (1) शिक्षक, (2) विद्यार्थी, (3) पाठ्यक्रम। शिक्षण में शिक्षक तथा विद्यार्थी के मध्य अन्तःक्रिया (Interaction) पाठ्यक्रम के माध्यम से होती है। इस प्रकार पाठ्यक्रम शिक्षण की क्रियाओं को दिशा प्रदान करता है। इन तीनों घटकों की पारस्परिक अन्तःक्रिया द्वारा बालक का विकास किया जाता है। शिक्षण में उक्त तीनों घटकों का विशेष महत्व है। शिक्षण की इस प्रक्रिया में पाठ्यक्रम के कार्यों को निम्नलिखित बिन्दुओं में स्पष्ट किया जा सकता है

1. शिक्षा के निर्धारित उद्देश्यों को प्राप्त करना।

2. शिक्षा के विभिन्न विषयों के शिक्षण और क्रियाओं के उद्देश्यों को प्राप्त करना।

3. विद्यार्थियों की मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं की पूर्ति करना। 

4. शिक्षण-अधिगम की प्रक्रिया को व्यवस्थित करना।

5. समय और शक्ति के सदुपयोग का मार्ग प्रशस्त करना। 

6. पाठ्यपुस्तकों के निर्माण में सहायता करना।

7. प्रश्नपत्रों को बनाने और उत्तरों के मूल्यांकन में सहायता करना। 

8. शिक्षा के स्तर को समान रखना। 

9 शिक्षकों को छात्रों के हित में लक्ष्य निर्धारित करने में सहायता करना। 

10. विद्यार्थियों में उपयुक्त मानसिक एवं शारीरिक दृष्टिकोणों और आदतों का विकास करना।

पाठ्यक्रम की आवश्यकता 
(Needs of Curriculum)

शिक्षा की आवश्यकता और पाठ्यक्रम की आवश्यकता समान है। परन्तु शिक्षा ऐतिहासिक समीक्षा से विदित होता है कि ये आवश्यकताएँ बदलती रहती हैं। इसलिए इन सभी आवश्यकताओं का उल्लेख यहाँ पर किया गया है

1. ज्ञान प्राप्त करने के लिए अन्य जीवों से प्रमुख भिन्नता मानवीय ज्ञान की दृष्टि मानी जाती है। 

2. मानसिक पक्षों का प्रशिक्षण तथा विकास करने के लिए विभिन्न विषयों शिक्षण से मानसिक पक्षों का प्रशिक्षण किया जाता है।

3. व्यवसाय तथा नौकरियों के लिए तैयार करना। शिक्षा नौकरियों के लिए है।

4. छात्रों में अभिरुवियाँ उत्पन्न करने के लिए छात्रों की क्षमताओं के अनुरूप उनका विकास करना।

5. प्रजातन्त्र में सामाजिक क्षमताओं का विकास करना तथा ऐसे नागरिको को तैयार करना जो प्रजातन्त्र को नेतृत्व प्रदान कर सके।

6. छात्रों को व्यवसायों के लिए प्रशिक्षण देकर तैयार करना नई शिक्षा नीति की प्राथमिकता है। 

7. आम मानवीय गुणों के विकास के लिए शिक्षा में महत्त्व दिया जाता है। आत्मानुभूति का विकास किया जाए।

8. सामाजिक आवश्यकताओं के लिए नागरिकों को तैयार करना तथा सौन्दर्यानुभूति गुणों का विकास करना। 

9. प्रमुख आवश्यकता आज जीने की है कि आज की परिस्थितियों में जीवित रह सकें। इसके लिए प्रशिक्षण दिया जाए। 

10. छात्रों को भावी जीवन के लिए तैयार कर सके। शिक्षा भावी जीवन-यापन के लिए दी जाती है।

11. तकनीकी विकास तथा वैज्ञानिक आविष्कारों के लिए भी तैयार करना। 

शिक्षा एक सामाजिक प्रक्रिया है जो सामाजिक परिवर्तन एवं सामाजिक नियन्त्रण के लिए प्रभावी यन्त्र है। इसलिए समाज व राष्ट्र की भावी आवश्यकताओं एवं परिवर्तनों के लिए पाठ्यक्रम का विकास करना प्रमुख आवश्यकता है।

पाठ्यक्रम को प्रभावित करने वाले घटक 
(Factors Influencing Curriculum)

पाठ्यक्रम का सम्पादन शैक्षिक तथा सामाजिक परिस्थितियों में किया जाता है। इसलिए शैक्षिक तथा सामाजिक घटक पाठ्यक्रम को प्रभावित करते हैं। यहाँ पर पाठ्यक्रम को प्रभावित करने वाले चटकों का विवेचन किया गया है |

1. शिक्षा-व्यवस्था (Organization of Education)- शिक्षा के इतिहास से यह विदित है कि अतीतकाल से ही शिक्षा-व्यवस्था और पाठ्यक्रम का गहन सम्बन्ध रहा है और एक-दूसरे क प्रभावित करते रहे है। पाठ्यक्रम प्रायः लचीला तथा परिवर्तनशील रहा है। छोटे बालकों का पाठ्यक्रम अनुभव केन्द्रित रहा है। माध्यमिक स्तर विषय-केन्द्रित रहा है। शिक्षा-व्यवस्था के बदलने के पाठ्यक्रम प्रारूप भी बदल जाता है।

2. परीक्षा प्रणाली (Examination System) – परीक्षा प्रणाली पाठ्यक्रम को प्रभवित करती है। निबन्धात्मक परीक्षा के पाठ्यक्रम का स्वरूप वस्तुनिष्ठ परीक्षा से बिल्कुल ही भिन्न प्रकार का होता है। वस्तुनिष्ठ परीक्षा में पाठ्यवस्तु के सूक्ष्म पाठ्यवस्तु पर ही प्रश्न पूछे जाते हैं, जबकि निवन्यात्मक परीक्षा पाठ्यवस्तु के व्यापक स्वरूप पर प्रश्न पूछे जाते हैं। निबन्धात्मक परीक्षा से उच्च उद्देश्यों का मापन किया जाता है जबकि वस्तुनिष्ठ से निम्न उद्देश्यों का ही आंकलन किया जाता है।

3. शासन पद्धति (Form of Government) – शिक्षा द्वारा राष्ट्र तथा समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति की जाती है। शासन प्रणाली बदलने से पाठ्यक्रम के प्रारूप को बदलना होता है। केन्द्र तथा राज्य स्तर की पार्टी को सत्ता में बदलने से भी पाठ्यक्रम के प्रारूप पर प्रभाव पड़ता है। 

4. अध्ययन समिति (Board of Studies)- पाठ्यक्रम के प्रारूप का निर्माण अध्ययन समितियों द्वारा किया जाता है। विभिन्न स्तरों पर अध्ययन समितियों के द्वारा पाठ्यक्रम का निर्माण तथा सुधार किया जाता है। अध्ययन समिति के सदस्यों की सूझबूझ तथा अनुभवों द्वारा ही पाठ्यक्रम के प्रारूप को विकसित करते हैं। इसलिए इन सदस्यों की अभिरुचियों, अभिवृत्तियों तथा मानसिक क्षमताओं का सीधा प्रभाव पड़ता है। 

5. राष्ट्रीय शिक्षा आयोग तथा समितियाँ (National Education Commission and Committees) – शिक्षा में सुधार और विकास हेतु राष्ट्रीय शिक्षा आयोग तथा समितियाँ गठित की जाती हैं। भारत में स्वतन्त्रता के बाद से अनेक आयोग तथा समितियाँ गठित की गई। उन्होंने विश्वविद्यालय, माध्यमिक तथा प्राथमिक स्तर पर सुधार के लिए सुझाव दिए और उन सुझावों को लागू व्यवस्था पाठ्य करने का प्रयास किया गया जिससे पाठ्यक्रम के प्रारूप को भी बदलना पड़ा। 

6. सामाजिक परिवर्तन (Social Change) - सामाजिक परिवर्तन में आर्थिक परिवर्तनों को गति अधिक तीव्र है इसलिए ये आर्थिक तथा भौतिक परिवर्तन भी पाठ्यक्रम को प्रभावित करते है। विज्ञान तथा तकनीक के प्रशिक्षण (कम्प्यूटर) आदि सम्बन्धी नये पाठ्यक्रम विकसित किए जा रहे हैं। शिक्षा के अन्तर्गत दूरवर्ती शिक्षा (Distance Education) प्रणाली का विकास हुआ है, जिसमें माध्यमों तथा सम्प्रेषण विधियों का विशेष महत्त्व दिया गया है।

पाठ्यक्रम का प्रारूप भावी जीवन की तैयारी की दृष्टि से विकसित किया जाता है। छात्र, परिवार, विद्यालय व्यवस्था, सामाजिक परिवर्तन तथा आवश्यकताएँ पाठ्यक्रम के प्रारूप को विकसित करने में सहायक होते हैं परन्तु अतोत परम्पराओं और भावी जीवन में समन्वय स्थापित करना पड़ता है। छात्र की सामान्य तथा विशिष्ट आवश्यकताओं को ध्यान में रखना होता है।


पाठ्यक्रम के उद्देश्य, मूल तत्त्व तथा शैक्षिक तत्त्वों से सम्बन्ध

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पाठ्यक्रम के उद्देश्य
(Objectives of Curriculum)

शिक्षा की प्रक्रिया के तीन प्रमुख घटक होते हैं-

1. शिक्षक, 
2 शिक्षार्थी तथा 
3. पाठ्यक्रम। 

शिक्षण में शिक्षक तथा छात्र के मध्य अन्तःक्रिया (Interaction) पाठ्यक्रम के माध्यम से होती है। इस प्रकार पाठ्यक्रम शिक्षण की क्रियाओं को दिशा प्रदान करते हैं। इन तीनों घटकों की पारस्परिक अन्तःक्रिया द्वारा बालक का विकास किया जाता है। शिक्षण में तीन घटकों का विशेष महत्त्व होता है। इस प्रकार पाठ्यक्रम के प्रमुख उद्देश्य इस प्रकार हैं :-

1. पाठ्यक्रम बालक के सम्पूर्ण विकास हेतु साधन प्रदान करता है, जिसकी सहायता से शिक्षण की क्रिया को सम्पादित किया जाता है।

2. पाठ्यक्रम द्वारा मानव जाति के अनुभवों को सम्मिलित रूप से स्पष्ट करके संस्कृति तथा सभ्यता का हस्तान्तरण एवं विकास करना।

3. पाठ्यक्रम द्वारा बालक में मित्रता, ईमानदारी, निष्कपटता, सहयोग, सहनशीलता, सहानुभूति एवं अनुशासन आदि गुणों को विकसित करके नैतिक चरित्र का निर्माण करना। 

4. पाठ्यक्रम द्वारा बालक की चिन्तन, मनन, तर्क तथा विवेक एवं निर्णय आदि सभी मानसिक शक्तियों का विकास करना।

5. पाठ्यक्रम द्वारा बालक के विकास की विभिन्न अवस्थाओं से सम्बन्धित सभी आवश्यकताओं, मनोवृत्तियों तथा क्षमताओं एवं योग्यताओं के अनुसार नाना प्रकार की सृजनात्मक तथा रचनात्मक शक्तियों का विकास करना।

6. पाठ्यक्रम द्वारा सामाजिक तथा प्राकृतिक विज्ञानों एवं कलाओं तथा धर्मों के आवश्यक ज्ञान द्वारा ऐसे गतिशील तथा लचीले मस्तिष्क का निर्माण करना चाहिए, जो प्रत्येक परिस्थिति में साधनपूर्ण तथा साहसपूर्ण बनकर नवीन मूल्यों का निर्माण करना।

7. पाठ्यक्रम द्वारा ज्ञान तथा खोज की सीमाओं को बढ़ाने के लिए अन्वेषकों का सृजन करना। 

8. पाठ्यक्रम द्वारा विषयों तथा क्रियाओं के बीच की खाई को पाटकर बालक के सामने ऐसी क्रियाओं को प्रस्तुत करना व उसके वर्तमान तथा भावी जीवन के लिए उपयोगी बनाना । 

9. पाठ्यक्रम द्वारा बालक में जनतन्त्रीय भावना का विकास करना।

10. पाठ्यक्रम शिक्षण क्रियाओं तथा शिक्षक तथा छात्र के मध्य अन्तःप्रक्रिया के स्वरूप निर्धारित करना।

पाठ्यक्रम के मूल तत्त्व
(Basic Elements or Determinants of Curriculum)

शिक्षा को प्रक्रिया का सम्पादन शिक्षक द्वारा किया जाता है। शिक्षक अपनी क्रियाओं का नियोजन कक्षा शिक्षण के लिए करता है। उसके प्रमुख तीन तत्त्व होते हैं—उद्देश्य, पाठ्यक्रम एवं शिक्षण विधियाँ। 'पाठ्यक्रम विकास' में पाठ्यक्रम तथा शिक्षण विधियों को महत्त्व दिया जाता है। पाठ्यवस्तु तथा शिक्षण विधियों का नियोजन उद्देश्यों की दृष्टि से किया जाता है। एक पाठ्यवस्तु से कोई उद्देश्य प्राप्त किए जा सकते हैं। परन्तु अधिगम अवसरों एवं परिस्थितियाँ उद्देश्यों के स्वरूप को सुनिश्चित करती हैं। विशिष्ट उद्देश्यों हेतु विशिष्ट अधिगम परिस्थितियों का नियोजन किया जाता है। शिक्षण तथा अधिगम क्रियाएँ पाठ्यक्रम के ही प्रमुख तत्त्व माने जाते हैं। इस प्रकार पाठ्यक्रम के चार मूल तत्त्व माने हैं— उद्देश्य, पाठ्यवस्तु, शिक्षण विधियाँ तथा मूल्यांकन। इन तत्त्वों में गहन सम्बन्ध होता है।

1. उद्देश्य – पाठ्यवस्तु, शिक्षण विधियों तथा परीक्षणों का नियोजन उद्देश्यों की दृष्टि से किया जाता है। अधिगम परिस्थितियों के स्वरूप से इन्हें प्राप्त करते हैं।

1. उद्देश्य

2. पाठ्यवस्तु

3. शिक्षण विधि

4. मूल्यांकन

2. पाठ्यवस्तु– पाठ्यवस्तु का स्वरूप अधिक व्यापक होता है। अधिगम परिस्थितियाँ उसके स्वरूप को सुनिश्चित करती हैं।

3. शिक्षण विधियाँ- उपर्युक्त शब्द शिक्षण का चयन उद्देश्यों की प्राप्ति से किया जाता है। शिक्षण विधियों का सम्बन्ध पाठ्यवस्तु से होता है। शिक्षण आव्यूह-परिस्थितियों को उत्पन्न करती है, जिससे छात्रों में अपेक्षित व्यवहार परिवर्तन किए जाते हैं जो पाठ्यवस्तु के स्वरूप को सुनिश्चित करते हैं।

4. मूल्यांकन- परीक्षा द्वारा पाठ्यवस्तु तथा शिक्षण विधियों की उपादेयता के सम्बन्ध में जानकारी होती है और जो पाठ्यवस्तु को सुनिश्चित करते हैं।

पाठ्यक्रम का शैक्षिक तत्त्वों से सम्बन्ध 
(Relationship of Curriculum to Education Elements)

पाठ्यक्रम का शैक्षिक तत्त्वों से गहन सम्बन्ध होता है। शिक्षा प्रक्रिया के अन्तर्गत चार प्रमुख तत्त्व होते हैं—शिक्षण, अधिगम, पाठ्यक्रम तथा शैक्षिक नियोजन। शिक्षण तथा अधिगम में सम्बन्ध होता है क्योंकि शिक्षण क्रियाओं से अधिगम परिस्थितियाँ उत्पन्न की जाती हैं जिनमें छात्र अनुभव करता है। जिससे अनेक अपेक्षित व्यवहार परिवर्तन लाया जाता है। शिक्षण क्रियाओं का सम्पादन पाठ्यवस्तु के आधार पर किया जाता है, जिसका स्वरूप पाठ्यक्रम निर्धारित करता है, विद्यालय में शैक्षिक आयोजन (Educational Organization) के अन्तर्गत शिक्षण अधिगम के अतिरिक्त अन्य पाठ्यक्रम सहगामी क्रियाओं का नियोजन किया जाता है जिससे शैक्षिक परिस्थितियाँ आयोजित की जाती हैं। इस प्रकार के चारों तत्त्वों के आपसी संबंध का विवेचन एवं प्रस्तुतीकरण 'हासफोर्ड' ने अपनी पुस्तक (Theory and Instruction) के अन्तर्गत किया है। इन्होंने शिक्षा के चार तत्वों को महत्त्व दिया है

(अ) अधिगम (छात्र)

(ब) शिक्षण (शिक्षक) 

(स) पाठ्यक्रम  

(द) शैक्षिक नियोजन

(अ) अधिगम वह प्रक्रिया है जो व्यवहार में परिवर्तन लाती है।

(ब) शिक्षण वह प्रक्रिया है जो अधिगम में सुगमता प्रदान करती है। 

(स) पाठ्यक्रम में विद्यालयों द्वारा नियोजित अनुभवों को सम्मिलित किया जाता है।

(द) शैक्षिक नियोजन में समस्त शैक्षिक अनुभवों की क्रियाओं को सम्मिलित किया जाता है, जो विद्यालय में तथा विद्यालय से बाहर की जाती हैं।

इन चारों पक्षों की अन्तःप्रक्रिया में घटकों (Factors) का विवरण इस प्रकार है



शिक्षण के चारों पक्षों में अन्तः प्रक्रिया का स्वरूप


1. इसमें पाठ्यक्रम के उस पक्ष को शैक्षिक नियोजन में सम्मिलित किया जाता है जिसमें शिक्षक

की आवश्यकता नहीं होती है। 

2. इसमें शिक्षक, छात्र तथा पाठ्यक्रम तीनों के मध्य अन्तःप्रक्रिया होती है।

3. छात्र शैक्षिक नियोजन में बिना पाठ्यक्रम तथा शिक्षक के अन्तःक्रिया होती है।

4 छात्र तथा शिक्षक में पास के बिना शैक्षिक आयोजन से अन्तःप्रक्रिया होती है। 

5. शिक्षक तथा पाठ्यक्रम  के मध्य शैक्षिक आयोजन के अन्तर्गत अन्तःप्रक्रिया होती है।

6. शिक्षक तथा शैक्षिक आयोजन के मध्य बिना पाठ्यक्रम के अन्त प्रक्रिया होती है।

7. शिक्षक तथा छात्र के मध्य बिना पाठ्यक्रम तथा शैक्षिक नियोजन के अन्तर्गत अन्तःप्रक्रिया होती. है।

8. शिक्षक का व्यवहार बिना पाठ्यक्रम तथा शैक्षिक आयोजन के होता है।

9. पाठ्यक्रम तथा शैक्षिक आयोजन की अन्तः प्रक्रिया जो छात्र तक नहीं पहुंचती है। 

10. पाठ्यक्रम तथा शैक्षिक आयोजन में प्रयोग न किया जाए और न छात्रों तक पहुंच सके।

11 शैक्षिक आयोजन का वह कार्यक्रम जिसे प्रयुक्त ने किया जा सके।

12. छात्र का समस्त अधिगम शैक्षिक-आयोजन, शिक्षण तथा पाठ्यक्रम के द्वारा ही नहीं होता है। इसमें छात्र का वह अधिगम सम्मिलित किया जाता है जो अन्य माध्यमों से होता है। इस प्रकार पाठ्यक्रम तत्त्व की भूमिका शिक्षा परिस्थितियों के नियोजन के लिए अहम होती है।



September 24, 2022

शैक्षिक उद्देश्यों का आशय व ब्लूम का शैक्षिक उद्देश्यों का वर्गीकरण

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शैक्षिक उद्देश्यों का आशय


शैक्षिक उद्देश्य विभिन्न उद्देश्यों का एक छोटा-सा पारिभाषिक स्वरूप है। शैक्षिक उद्देश्य के अन्तर्गत कक्षा-कक्ष में अध्ययनार्थ कार्य देकर दिये गये निर्देशों के आधार पर अपेक्षित उत्तर चाहे जाते हैं, अतः इन्हें अनुदेशनात्मक या व्यावहारिक उद्देश्यों के नाम से भी जाना जाता है। रॉबर्ट मेगर के सर्वप्रथम इन उद्देश्यों को छात्रों के व्यवहार के रूप में देखने का प्रयास किया। मेगर के अनुसार, शैक्षिक उद्देश्यों का लेखन केवल कुछ शब्द या संकेतों का संकलन ही नहीं हैं जो हमारे एक या दो शैक्षिक प्रयासों या शैक्षिक उद्देश्य का वर्णन करते हैं।" शैक्षिक उद्देश्यों को व्यावहारिक रूप में अभिव्यक्त करने के लिए मेगर ने तीन बातों का होना आवश्यक बताया है

1. मापन-व्यावहारिक उद्देश्य मापन योग्य होने चाहिए।

2. निरीक्षण-ये निरीक्षण योग्य होने चाहिए। 

3. प्राप्तव्य-ये प्राप्तव्य होने चाहिये।

परिभाषाएँ

1. बी० एस० ब्लूम- 'शैक्षिक उद्देश्यों की सहायता से न केवल पाठ्यक्रम की रचना तथा अनुदेशन के लिये निर्देश ही दिया जाता है अपितु इनमें मूल्यांकन की प्रविधियों की रचना एवं प्रयोग के लिये भी विशिष्टताएँ प्राप्त होती हैं।' 

2. हॉस्टन- 'शिक्षण उद्देश्यों को व्यावहारिक संज्ञा के रूप में लिखना एक योग्यता या कौशल है, इन उद्देश्यों को ही शिक्षण समाप्त होने पर प्राप्त किया जाता है।'

3. ई० जे० फ्रस्ट - 'शिक्षण उद्देश्य व्यक्ति के व्यवहार में वांछित परिवर्तन से संबंधित होते है। जिन्हें हम शिक्षा के द्वारा लाने का प्रयत्न करते हैं।'

4. एन० सी० ई० आर० टी० के मूल्यांकन तथा परीक्षा अंक के अनुसार- 'उद्देश्य वह बिन्दु अथवा अभीष्ट अथवा अभीष्ट है जिसकी दिशा में कार्य किया जाता है अथवा उद्देश्य वह व्यवस्थित वर्णन परिवर्तन हैं जिसे क्रिया द्वारा प्राप्त किया जाता है या जिसके लिये हम क्रिया करते हैं।'


इन परिभाषाओं से शिक्षण उद्देश्य के बारे में स्पष्ट है कि शिक्षक शिक्षण कार्य प्रारंभ करने से पूर्व निर्धारित करता है कि शिक्षण के पश्चात शिक्षार्थी में किस प्रकार के परिवर्तन होंगे तथा उसके व्यवहार में क्या नवीन प्रदर्शन होगा। शिक्षार्थी के व्यवहार में यह नवीन परिवर्तन एवं प्रदर्शन ही शिक्षा के उद्देश्य होते हैं। जिन्हें प्राप्त करने के लिये शिक्षण का कार्य करना होता हैं।

उद्देश्यों को निर्धारित करने के लाभ

1. उद्देश्यों से कार्य निश्चित हो जाता है यानी कार्य की सीमा रेखा निश्चित हो जाती है।

2. छात्र व अध्यापक के कक्षावार कार्य व व्यवहार तय हो जाते हैं। 

3. अध्यापक को दिशा व निर्देश अर्जित होते हैं।

4. उच्च अध्ययन में सहायक होते हैं।

5. पाठ्यक्रम सहगामी क्रियाओं व निष्पत्ति का मापन व मूल्यांकन संभव हो जाता है। 

6. शैक्षिक कार्य स्पष्ट हो जाता है।

शैक्षिक उद्देश्यों का वर्गीकरण

शैक्षिक उद्देश्यों का संबंध शिक्षार्थियों के व्यवहार परिवर्तन से होता है। शिक्षार्थियों के व्यवहार के तीनों पक्षों-ज्ञानात्मक, भावात्मक तथा क्रियात्मक-में शिक्षण के माध्यम से परिवर्तन लाने का प्रयास किया जाता है। व्यवहार में परिवर्तन के कार्य का मूल्यांकन करने के लिये आवश्यक होता है कि पूर्व में इस कार्य के उद्देश्यों को स्पष्ट रूप से निर्धारित करके लिख लेना चाहिए। उद्देश्यों को स्पष्ट रूप से लिखने के लिये इन उद्देश्यों का वर्गीकरण करने का प्रयास किया गया। वर्गीकरण का आधार भी शिक्षार्थी के व्यवहार के तीनों पक्षों ज्ञानात्मक, भावात्मक एवं क्रियात्मक को बनाया गया।

सर्वप्रथम शिक्षा के क्षेत्र में यह महत्वपूर्ण कार्य शिक्षाविद् बी० एस० ब्लूम ने किया। जिन्होंने शिक्षार्थी के व्यवहार को ज्ञानात्मक पक्ष का वर्गीकरण 1956 में किया। इसीलिये बी० एस० ब्लूम को शिक्षण उद्देश्यों के वर्गीकरण का जन्मदाता कहा जाता है व शैक्षिक उद्देश्यों के वर्गीकरण को ब्लूम टेक्सोनॉमी के नाम से जाना जाता है। बाद में 1964 में ब्लूम, क्रेथवाल तथा मैसिया ने भावात्मक पक्ष का वर्गीकरण किया। 1969 में ई० जे० सिम्पसन ने अलग से क्रियात्मक पक्ष का वर्गीकरण किया, जिसे आज शैक्षिक उद्देश्य के वर्गीकरण में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।


ब्लूम का शैक्षिक उद्देश्यों का वर्गीकरण




ज्ञानात्मक पक्ष के उद्देश्य

1. ज्ञान- इस उद्देश्य के अन्तर्गत शिक्षार्थी विषय से संबंधित शब्दों पद तथ्यों नियम परिभाषाओं, कारकों तथा सूचनाओं को जानता है। इसमें शिक्षार्थियों में सूचनाओं के प्रत्यास्मरण तथा पहचान करने की क्षमता का विकास होता है। ज्ञान स्तर के लिये ब्लूम द्वारा सीखने के उपलब्धियाँ निम्न बतायी गयी हैं

(1) विशिष्ट वस्तुओं का ज्ञान। 

(2) साधनों का ज्ञान।

(3) सार्वभौम वस्तुओं का ज्ञान।

2. बोध- ज्ञान से उच्च स्तर की मानसिक योग्यता का बोध है। क्योंकि बोध के अन्तर्गत ज्ञान निहित होता है। यहाँ बोध का अर्थ है-नवीन ज्ञान का शिक्षार्थियों की समझ में आना। ज्ञ के अन्तर्गत शिक्षार्थी पाठ्यवस्तु के जिन अंशों को सीख लेता है उनका अपने शब्दों में अनुवार करना, व्याख्या करना, गणना करना आदि अवबोध के अन्तर्गत आता है। 

3. प्रयोग- किसी ज्ञान को नई परिस्थितियों में तभी प्रयोग किया जा सकता है जब व्यक्ति को विषय वस्तु का ज्ञान हो और साथ में उसकी समझ भी हो अर्थात प्रयोग के लिये ज्ञान और बोध दोनों का होना आवश्यक हैं। इसके अन्तर्गत शिक्षार्थी नियमों व सिद्धान्तों क सामान्यीकरण, निराकरण करना तथा तथा प्रयोग में लाना जानता है।

4. विश्लेषण- यह अपेक्षाकृत उच्च कोटि की योग्यता होती है। इसके अन्तर्गत तथ्यो घटनाओं, सिद्धान्तों सभी का सार्थक भागों में विभाजन कर उनमें संबंध स्थापित करना आत है। तथ्यों या सिद्धान्तों को समझने के लिये यह आवश्यक है कि उसको विभिन्न संबंधित भार्ग में विभाजित किया जाये। 

5. संश्लेषण- पूरी विषय वस्तु का ज्ञान होने के पश्चात् शिक्षार्थी ज्ञान को नया रूप दे है। यह संश्लेषण के अन्तर्गत आता है कि शिक्षार्थी अपने ज्ञान व बोध के आधार पर सृजनात्मक योग्यता का उपयोग अक्सर हुए नवीन तथ्यों, प्रत्ययों या वस्तुओं का नर्माता करें इसके अन्तर्गत शिक्षार्थी में सृजनात्मक योग्यता का विकास होता है। इस योग्यता को प्राप करने के बाद शिक्षार्थी अपने नवीन विचार प्रस्तुत करने लगता है।

6. मूल्यांकन- यह ज्ञानात्मक क्षेत्र का उच्चतम स्तर का उद्देश्य है। इसके अन्तर्गत घटनाओं, तथ्यों, सिद्धान्तों आदि का आन्तरिक व बाह्य साक्षियों द्वारा आलोचनात्मक मूल्यांकन करना होता है। इस उद्देश्य की प्राप्ति के पश्चात् शिक्षार्थी में निर्णय लेने की क्षमता आ जाती है। ज्ञानात्मक पक्ष, भावात्मक पक्ष तथा क्रियात्मक पक्ष के उद्देश्यों को उनकी कार्यक्रियाओं सहित हम इस तालिका के माध्यम से स्पष्ट कर सकते हैं

ज्ञानात्मक पक्ष

बी० एस० ब्लूम के द्वारा विकसित ज्ञानात्मक पक्ष में निम्न कार्यक्रियाओं का वर्णन किया गया है।





भावात्मक पक्ष के उद्देश्य

भावात्मक पक्ष के उद्देश्यों का वर्गीकरण बी० एस० ब्लूम, क्रेथवाल व मैसिया के द्वारा 1964 में विकसित किया गया। इसमें इन्होंने छः वर्गों का निर्धारण किया है

1. ग्रहण करना- शिक्षण के समय किसी भी उद्दीपक के फलस्वरूप कुछ न कुछ ग्रहण किया जाता है। शिक्षार्थियों द्वारा संवेदनशीलता के परिणामस्वरूप क्रिया करने के द्वारा जो ग्रहण किया जाता है, इस 'ग्रहण करना' के अन्तर्गत आ जाता है। इसके लिये शिक्षार्थियों में क्रिया के प्रति जागरूक होना होता है तथा क्रिया करने की इच्छा शिक्षार्थियों में होनी आवश्यक होती हैं।

2. अनुक्रिया - ग्रहण करने के बाद शिक्षार्थी प्राप्त ज्ञान के अनुसार अनुक्रिया करता है। इससे प्रेरित रहते हुए शिक्षार्थी अनुक्रियाओं में सहमति दर्शाता है, अनुक्रियाओं की आवृत्ति को बढ़ाता है तथा अनुक्रिया के बाद संतोष की प्राप्त करता है।

3. अनुमूलन- जीवन में काम आने वाले मूल्यों की जानकारी कर शिक्षार्थी द्वारा उनमें से कुछ को अपनी और से मान्यता प्रदान करता है। इन मूल्यों को प्राप्त करने के लिये शिक्षार्थी क्रियाएँ भी अक्सर है। कुछ मूल्यों को प्राथमिकता देते हुए सीखने के लिये उन्हें अहम् स्थान प्रदान अक्सर हैं।

4. विचारना - अनेक मूल्यों में से किस मूल्य को शिक्षार्थी द्वारा महत्व देना है-यह विचारने के अन्तर्गत आ जाता है। चूँकि जैसे-जैसे शिक्षार्थी की जानकारी में अनेक मूल्यों का आगमन होता है वैसे-वैसे शिक्षार्थी उनमें से विचार कर कुछ मूल्यों को ग्रहण करने हेतु छांट लेता है। 

5. व्यवस्था - शिक्षार्थी द्वारा निर्धारित विभिन्न मूल्यो को एक व्यवस्थित क्रम प्रदान करना 'व्यवस्था' के अन्तर्गत आ जाता है। शिक्षार्थी की जानकारी में अनेकानेक मूल्यों का प्रवेश होता है |

6. विशेषीकरण- मूल्यों के सामान्य समूह को ध्यान में रख कर शिक्षक यह जानने का प्रयास करता है कि शिक्षार्थियों ने मूल्यों को किस विशेष क्रम में व्यवस्थित किया है। इसके पश्चात् शिक्षक द्वारा मूल्यों के विकास में किये गये कार्य को सफलता प्राप्त होने की संभावनाओं में वृद्धि होती हैं| 

 भावात्मक पक्ष में निम्न कार्यक्रियाओं का वर्णन किया गया है |



क्रियात्मक पक्ष के उद्देश्य

बी० एस० ब्लूम ने क्रियात्मक पक्ष का वर्णन अक्सर हुए छ वर्गों से विभाजित किया उद्दीपन, कार्य करना, नियंत्रण, समायोजन, स्वभावीकरण, आदत पालना। बाद में ई० जे० सिम्पसन ने 1969 में क्रियात्मक उद्देश्यों का शारीरिक क्रियाओं के प्रशिक्षण से संबंधित होने के आधार पर पाँच भागों में विभक्त किया जिसे शिक्षा के क्षेत्र में यथोचित स्थान प्रदान किया गया। ये निम्न प्रकार है :-

1. प्रत्यक्षीकरण- प्रत्यक्षीकरण से तात्पर्य प्रत्यक्ष रूप से वस्तुओं को देखना है। इससे प्रत्यक्ष अनुभवों की प्राप्ति होती है। स्पष्ट है कि शिक्षार्थी द्वारा पाँचों ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से ग्रहण की गयी बाहा वस्तुओं, अनुभवों, वृतान्तों आदि को प्रत्यक्षीकरण में लिया जाता है। इसमें शिक्षार्थियों द्वारा प्राप्त अनुभवों की व्याख्या करने की योग्यता भी सम्मिलित हैं।

2. व्यवस्था- इसका संबंध प्राप्त प्रत्यक्ष अनुभवों को मानसिक, शारीरिक व भावात्मक रूप से जीवन में काम आने की प्राथमिकता के आधार पर व्यवस्था करने से है। इसमें शिक्षार्थी द्वारा ग्रहण अनुभवों का समायोजन उत्तम ढंग से किया जाता है।

3- निर्देशात्मक अनुक्रिया- इसमें शिक्षार्थियों द्वारा किसी योग्य व्यक्ति के निर्देशन में की जाने वाली अनुक्रियाएँ आती हैं। कई कौशल सीखते समय बार-बार कठिन अभ्यास की आवश्यकता होती है जिसे किसी विशेष ढंग से करने पर वह सरल हो सकता है। इस प्रकार के कौशल में पारंगत होने के लिये निर्देशात्मक अनुक्रिया की जाती है।

4. कार्यप्रणाली- कार्यप्रणाली से तात्पर्य शिक्षार्थियों में किसी कार्य को करने के लिये उत्पन्न आत्मविश्वास से है। यह कौशल विकसित होने के बाद की स्थिति है। प्राप्त कौशल के प्रयोग हेतु आवश्यक आत्मविश्वास व परिस्थितियों के लिये जो अनुक्रियाएँ की जाती हैं-कार्यप्रणाली के अन्तर्गत आ जाती हैं।

5. जटिल प्रत्यक्ष अनुक्रिया- यह क्रियात्मक पक्ष के उद्देश्यों का उच्चतम वर्ग है। इसमें शिक्षार्थी किसी भी कौशल में इतना कुशल हो जाता है कि वह वास्तविक जीवन की जटिल से जटिल स्थिति में कौशल तथा प्रयोग करके समय तथा शक्ति को 










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